समर्थित विधायकों से गहलोत सरकार को फायदा लेकिन संगठन को नुकसान

-बसपा और समर्थित विधायकों का कांग्रेस संगठन में बढ़ रहा दखल -संगठनात्मक चुनावों में कांग्रेस सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं की अनदेखी -पंचायतों निकाय चुनाव के बाद अब संगठन चुनाव में भी समर्थित विधायकों की जमकर पूछ - संगठन में समर्थित विधायकों के बढ़ते प्रभाव से नाराज हैं पार्टी के नेता 20 सीटों पर कांग्रेस संगठन के लगातार कमजोर होने का दावा

June 22, 2022 7:07 pm
समर्थित विधायकों से गहलोत सरकार को फायदा लेकिन संगठन को नुकसान

जयपुर। राज्य की गहलोत सरकार को भले ही 13 निर्दलीय विधायकों और समर्थित विधायकों का समर्थन मिल रहा हो, कई बार समर्थित विधायक सरकार के लिए संकटमोचक बने हैं, लेकिन सरकार के लिए संकटमोचक बने समर्थित विधायक कांग्रेस संगठन के लिए सिरदर्द साबित हो रहे हैं। समर्थित विधायकों का सरकार के साथ-साथ अब कांग्रेस संगठन में भी लगातार दखल बढ़ रहा है, जिससे कांग्रेस हलकों में इसे लेकर नाराजगी सामने आ रही है। इसे लेकर साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं ने भी समर्थित विधायकों के संगठन में बढ़ते दखल को लेकर मोर्चा खोल दिया है और प्रदेश नेतृत्व से लेकर आलाकमान तक अपनी बात पहुंचाई है। माना जा रहा है कि इस मामले को लेकर आगे और घमासान तेज हो सकता है।

संगठन चुनाव में समर्थित विधायकों की हो रही है पूछ

दरअसल सरकार को समर्थन दे रहे 13 निर्दलीय विधायकों, बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों और अन्य समर्थित विधायकों की संगठन में जमकर पूछो रही है। संगठन चुनाव में भी समर्थित विधायकों की पसंद के ही ब्लॉक निर्वाचन अधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी लगाए गए हैं। यहां तक कि समर्थित विधायक आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के सिंबल पर लड़ने की संभावनाओं के चलते अपनी पसंद के ही ब्लॉक अध्यक्ष और निचले स्तर के संगठन में अपने लोगों को एडजस्ट कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं, जबकि इन्हीं विधायकों के सामने साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं की मांग और पसंद की अनदेखी हो रही है।

कांग्रेस के नेताओं में इसलिए बढ़ रही नाराजगी

समर्थित विधायकों के कांग्रेस संगठन में बढ़ रहे दखल को लेकर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे नेताओं की नाराजगी अब बाहर आने लगी है। दरअसल इन नेताओं की नाराजगी की वजह यह है कि सरकार को समर्थन दे रहे समर्थिक विधायकों ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशियों को हराने का काम किया था और कांग्रेस पार्टी को कमजोर किया था। अब उन्हीं विधायकों को सरकार और संगठन में तवज्जो मिल रही है, उन्हीं की पसंद के प्रशासनिक अधिकारी लगा लगाए जा रहे हैं तो संगठन में भी उनकी पसंद को महत्व दिया जा रहा है। कांग्रेस सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं का कहना है कि समर्थित विधायकों को महत्व देने से पार्टी उन क्षेत्रों में कमजोर रहेगी और विधानसभा चुनाव में पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची है गुहार

समर्थक विधायकों को सत्ता और संगठन में ज्यादा महत्व मिलने का मामला प्रदेश नेतृत्व से लेकर कांग्रेस आलाकमान तक भी पहुंचा है। समर्पित विधायकों से विधानसभा चुनाव हारे कांग्रेस नेताओं ने सोनिया गांधी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और प्रदेश संगठन चुनाव प्रभारी संजय निरुपम से गुहार की है कि समर्थक विधायकों को संगठन चुनाव में महत्व नहीं मिलना चाहिए।

निकाय- पंचायत चुनाव में भी समर्थक विधायकों की चली

वहीं इससे पहले प्रदेश में हुए पंचायतों निकाय चुनाव में भी निर्दलीय और अन्य समर्थक विधायकों की जमकर चली थी। निकाय और पंचायत चुनाव में समस्त विधायकों की पसंद के ही लोगों को टिकट दिए गए थे और कांग्रेस सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं की मांगों को अनसुना कर दिया गया था।

20 सीटों पर कांग्रेस के कमजोर होने का दावा

इधर कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ चुके नेताओं का कहना है कि प्रदेश में 20 सीटें ऐसी हैं जहां पर बसपा से कांग्रेस में आए विधायकों, निर्दलीय विधायकों और अन्य समर्थक विधायकों के दखल के चलते इन क्षेत्रों में कांग्रेस के कमजोर होने का दावा किया गया है। गहलोत सरकार को जिन चीन विधायकों का समर्थन मिल रहा है उनमें बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों, 13 निर्दलीय विधायक और एक आरएलडी के विधायक शामिल हैं। बहरहाल इन विधायकों के समर्थन से भले ही सरकार पर कोई खतरा न हो लेकिन अपने ही कार्यकर्ताओं नेताओं की उपेक्षा का खामियाजा कांग्रेस पार्टी को आने वाले विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।कहा कि बीजेपी के देशभर में 350 कार्यालय बन चुके हैं। बीजेपी को बताना चाहिए कि इतना पैसा उनके पास कहां से आया।

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