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वास्तुशास्त्र – सास-बहु का संबंध

            वास्तुविद्ध -बाबूलाल शास्त्री

 

आज का मानव अर्थ के पीछे दौड़ रहा है, एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, पाश्चात्य संस्कृति अनुसार संस्कारों में परिवर्तन के साथ-साथ निवास/व्यवसाय/स्थल मे भी निर्माण कर वास्तु नियमों की अवहेलना की जा रही हैं। जिससे परिवार सीमित होता जा रहा है, एवं परिवार में सास बहु, भाई, बहिन, भाभी, माता, पिता में टकराव व अलगाव की परिस्थितियाॅ होती जा रही है,पूर्व में परिवार सयंुक्त रहता था व सम्बन्ध मधुर रहते थे।

परिवार में सास बहु व परिवार के सदस्यों के रिश्तों में मधुरता, स्नेह, प्रेम वास्तु शास्त्रीय नियमों का साधारण सा प्रयोग कर लाई जा सकती हैं, यदि वास्तु शास्त्रीय नियमों का साधारणसा प्रयोग निवास में किया जावे तो सास बहु के रिश्तों को मधुर बनाया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र अनुसार युवक व युवती की जन्मकुण्डली के अनुसार राशि, लग्न, नक्षत्र व गण मिलान किये जाते है किन्तु परिवार के किसी भी सदस्य से उनका मिलान नही किया जाता है ।

जिसके विपरीत परिणामस्वरूप परिवार से अनबन की स्थिति के साथ-साथ पति-पत्नि में भी टकराव हो जाता है, वास्तु शास्त्र-वास्तु वस्तु से सम्बन्धित वह विज्ञान है जिस पर भवन, इमारत नियमानुसार बनाकर उसके रहने से विध्न प्राकृतिक उत्पादों से एंव उपद्रवों से बचाते हुए सब प्रकार से सुख धन सम्पदा बुद्वि सुख-शान्ति के साथ-साथ परिवार के सदस्यों में व सास-बहु में मधुर सम्बन्ध हो, क्योंकि मानव के विकास में परिवार के संचालन में दोनो प्रमुख है ।

अतः वास्तु शास्त्र अनुसार परिवार में किस स्त्री पुरूष सास-बहु को किस भाग में सोना बैठना चाहिये जिससे उनमें मधुर सम्बन्ध हो । परिवार का मुखिया दक्षिण दिशायें शयन करता है तो उसकी पत्नि गृह स्वामिनी भी दक्षिण दिशा में शयन करेगी । दक्षिण दिशा में सिर एंव उतर दिशा में पैर करके सोना शुभ माना गया है, क्योंकि मानव का शरीर भी एक छोटे चुम्बक की तरह कार्य करता है, शरीर का उतरी धुव्र सिर है तथा दक्षिणी धुव्र पैर है, षरीर के उतरी ध्रुव का भौगोलिक दक्षिण और शरीर के दक्षिण ध्रुव का भौगोलिक उतर की ओर होना मनुष्य की चिंतन प्रणाली को नियंत्रित करता है, मस्तिष्क की एंव शरीर की बहुत सारी रश्मियाॅं विद्युत चुम्बकीय प्रभाव से नियंत्रित होती है,

अतः दक्षिण में सिर करके सोना पृथ्वी के विधुत चुम्बकीय प्रभाव से समन्वय बैठाना है इससे स्वभाव में गंभीरता आती है एंव व्यक्ति में स्थित बुद्वि व विकास सम्बन्धी विकास की योजनायें पैदा होती है, साथ ही दक्षिण दिशा आत्मविश्वास में वृद्वि करती है, दक्षिण दिशा में स्थित व्यक्ति नैतृत्व क्षमता से युक्त हो जाता है, यदि दक्षिण में सिर करके सोने की सुविधा नही हो तो पूर्व में सिर करके तथा पश्चिम में पैर करके शयन किया जा सकता है । गृह स्वामी/गृह स्वामिनी या कोई अन्य स्त्री यदि दक्षिण दिशा में शयन/निवास करती है तो वह प्रभावशाली हो जाती है।

अतः स्पष्ट है कि परिवार के मुखिया स्त्री को दक्षिण दिशा में शयन/निवास करना चाहिये । कनिष्ठ स्त्रियाॅं दौरानी या बहु को शयन नही करना चाहिये। जो स्त्रियाॅं अग्नि कोण में शयन/निवास करती है उनका दक्षिण दिशा में शयन करने वाली स्त्रियों से मतभेद रहता है, अग्नि कोण में युवक व युवती अल्प समय के लिए शयन कर सकते है, यह कोण अध्ययन व शोध के लिये शुभ है ।

भवन के वावव्य कोण में जो स्त्रियाॅं शयन/निवास करती है उनके मन में उच्चाटन का भाव आने लगता है एंव वो अपने अलग से घर बसाने के सपने देखने लगती है , अतः इस स्थान पर अविवाहित कन्याओं को शयन कराना शुभ होता है क्योकि उनको ससुराल का घर संवारना है । इस कोण में नई दुल्हन या बहु को यह स्थान शयन हेतु कदापि उपयोग में नही लेने-देना चाहिये ।

यदि पुरूष वायव्य कोण में अधिक समय शयन करता है तो उसका मन परिवार से उचट जाता है व अलग होने की सोचता है यदि परिवार में दो या दो से अधिक बहुएॅं हो तो वास्तु शास्त्र के नियमो के अनुसार शयन /निवास का चयन कर स्नेह प्रेम व तालमेल बनाये रखा जा सकता है । भवन/निवास का सबसे शक्तिशाली भाग दक्षिण दिशा होता है, अतः इस भाग में सास को सोना चाहिये, अगर सास नहीं हो तो परिवार की बड़ी बहु को सोना चाहिये, दुसरे नम्बर की बहु (यदि सास नहीं हो) वरना प्रथम नम्बर की बहु को दक्षिण-पश्चिम में शयन करना चाहिये, उससे छोटी को पश्चिम दिशा में क्रमवार उससे छोटी बहु को पूर्व दिशा में शयन करना चाहिये यदि और छोटी बहू हो तो ईशान कोण मंे शयन करना चाहिये। दक्षिण में शयन करने वाली स्त्री को पति के बायीं और शयन करना चाहिये, अग्निकोण में शयन करने वाली स्त्री को दायीं ओर शयन करना चाहिये।

गृहस्थ-सांसारिक मामलों में पत्नि को पति की बायंी और सोना चाहिये। परिवार की मुखिया सास या बड़ी बहु को पूर्व या ईशान कोण में शयन नहीं करना चाहियें, वृद्वावस्था-अशक्त हो जाने की स्थिति में ईशान कोण में षयन किया जा सकता हैं। किन्तु वृद्वावस्था-अशक्त हो जाने पर अग्निकोण में शयन नहीं करना चाहिये। अग्निकोण में अग्नि कार्य से स्त्रियों की ऊर्जा का सही परिपाक हो जाता है, अग्नि होत्र कर्म भी शुभ हैं, अग्निकोण में यदि स्त्रियाॅ तीन घंटा व्यतीत कर पाक कर्म करे तो उनका जीवन उन्नत होता है, एवं व्यंजन स्वादिष्ट होते हैं, शयनकक्ष का बिस्तर अगर डबल बेड हो एवं उसमें गददे अलग-अलग हो तथा पति-पत्नि अलग-अलग गददे पर सोते हो तो उनके बीच तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है एंव आगे चलकर अलग हो जाते हैं, अतः शयनकक्ष में ऐसा बिस्तर होना चाहिये जिससे गददा एक हो ।

गृह/निवास उतराभिमुख मकानों में उतर दिशा से ईशान कोण पर्यन्त, पुर्वाभिमुख मकानों में पूर्व दिशा मध्य से अग्निकोण पर्यन्त, दक्षिणाभिमुख मकानों में दक्षिण दिशा मध्य से नेऋत्य कोण पर्यन्त, तथा पश्चिमाभिमुख मकानों में पश्चिम दिशा मध्य से वावव्य कोण पर्यन्त, यदि बाह्य द्वार न रखा जाये तो स्त्रियों में अधिक समन्वय व प्रेम होता है।

वास्तुविद्धः-बाबू लाल शास्त्री (साहू)
मनु ज्योतिष एंव वास्तु शोध संस्थान
बडवाली हवेली के सामने सुभाष बाजार टोंक मो. न. 9413129502, 9261384170

liyaquat Ali
Sub Editor @dainikreporters.com, Provide you real and authentic fact news at Dainik Reporter.

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