टोंक रत्न पण्डित रामनिवास अग्रवाल ‘नदीम’: जिनके घर में बेहिसाब परवान चढ़ी उर्दू ज़ुबान

Tonk news / सुरेश बुन्देल । अदबी तारीख़ में ‘नदीम’ तख़ल्लुस से मशहूर हुए पण्डित रामनिवास अग्रवाल जिले की ऐसी वाहिद शख्सियत थे, जिन्होंने उर्दू से बेपनाह मोहब्बत की। रियासतकालीन टोंक में जिस गैर मुस्लिम शख्स ने उर्दू को उर्दूदां लोगों से ज़्यादा चाहा, उसकी नजीर अदब के अतीत में बहुत कम मिलती है। अपनी …

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May 5, 2020 6:52 am

Tonk news / सुरेश बुन्देल । अदबी तारीख़ में ‘नदीम’ तख़ल्लुस से मशहूर हुए पण्डित रामनिवास अग्रवाल जिले की ऐसी वाहिद शख्सियत थे, जिन्होंने उर्दू से बेपनाह मोहब्बत की। रियासतकालीन टोंक में जिस गैर मुस्लिम शख्स ने उर्दू को उर्दूदां लोगों से ज़्यादा चाहा, उसकी नजीर अदब के अतीत में बहुत कम मिलती है।

अपनी विद्वता से पण्डित जी कहलाने वाले रामनिवास अग्रवाल का जन्म मथुरा से टोंक आए लाला मुरलीधर अग्रवाल के घर 5 फरवरी 1906 में हुआ। मुकम्मल आलिम और फाजिल मुदर्रिस के तौर पर पण्डित जी की काबिलियत आज भी काबिले- फख्र है। उस जमाने में उर्दू और फारसी में एम. ए. होना काफी मायने रखता था, वो भी आगरे सरीखी मोअतबर यूनिवर्सिटी से।

इसके अलावा अदीब, कामिल, मुंशी और हिन्दी के इम्तिहान इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पास करना पण्डित जी की शख्सियत में चार चाँद लगाने जैसा रहा। अपनी तालीमात की बदौलत पण्डित जी हाई स्कूल के हैड मास्टर तो रहे ही, उर्दू और फारसी के बेहद काबिल लेक्चरर भी रहे।

बतौर मुलाजमीन 1960 में पुरातत्व विभाग के सहायक निदेशक ओहदे से रिटायर होना कम बात नहीं है। 12 जनवरी 1965 को उनका देहावसान हुआ लेकिन उनकी अदबी खिदमातों के फसाने आज भी सुने- सुनाए जाते हैं।

अदबी विरासत को संभाला बेटे हनुमान प्रसाद सिंहल ने
बतौर शौरा पण्डित जी का उर्दू और फारसी में शेर लिखने और पढऩे का अंदाज हमेशा काबिले- दाद रहा।

उन्होंने ‘टोंक की बस्ती’ नामक किताब लिखी तथा ‘रणथम्भौर’ नाम से लेख भी लिखा। उनकी लिखी उर्दू और फारसी की प्रारम्भिक किताबों से लोगों ने दोनों जुबानें सीखीं। उनके बेहद काबिल और फरमाबरदार फरजन्द हनुमान प्रसाद सिंहल ने 1972 में जिले का एकमात्र उर्दू अखबार ‘नदीम’ भी निकाला, जो पंडित जी की अदबी खिदमातों की आलमी तस्दीक है।

वैसे भी पण्डित जी ने अरबी भाषा के तखल्लुस ‘नदीम’ के तर्जुमे के मुताबिक ही अपने नाम को रोशन किया। वे ताउम्र अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी व उर्दू अदब के हमसफर बने रहे। उर्दू सहाफत में ‘नदीम’ अखबार की खिदमात बेमिसाल रही। उसका दायरा सियासी ही नहीं रहा बल्कि मैयारी शायरों व अदीबों के खुतूत, बज्मी खवातीन, अदबी रिसाले व अफसाने शाया करना नदीम की दिलचस्पियों में शुमार रहा।

नदीम को मिले उर्दू कॉन्फ्रेंस नंबर इस बात की पुख्ता सनद है। पण्डित रामनिवास अग्रवाल द्वारा लिखी गजलों, नज़्मों, रुबाइयों, हम्द, नात, सलाम, मन्कबत से उनकी कौमी रवादारी का पता चलता है। 1958 में टोंक की म्यूनिसपिल्टी ने पण्डित जी की साहित्यिक सेवाओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उनके मकान वाले रास्ते का नाम मास्टर रामनिवास मार्ग रखा था,

जो आज भी सरकारी गजट में महफूज है।
*यादें रहीं हैं शेष पिता- पुत्र के अफसानों की

आज भी पंडित जी के तेलियों की गली वाले मकान में मास्टर रामनिवास नदीम, उत्तम चंद चन्दन और हनुमान प्रसाद सिंहल की यादें कहीं ना कहीं चाहरदीवारियों में पैबस्त हैं, जहां हर हफ्ते अदबी महफिलें सजा करती थीं। सबसे बड़ी बात तो यह कि किसी गैर मुस्लिम घर में उर्दू की तरक्की का पलना- बढ़ना टोंक की गंगा- जमुनी तहजीब की नायाब मिसाल है। यही चीज सरजमीने- टोंक के लिए भाईचारे का सुबूत भी है। भले ही मास्टर रामनिवास नदीम और हनुमान प्रसाद सिंहल आज इस दुनिया में नहीं है किन्तु उनकी अदबी खिदमातों के लिए शहर उन्हें हमेशा याद रखेगा।

सुरेश बुन्देल- टोंक @कॉपीराइट

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