टोंक रत्न फैयाज हुसैन ‘रागी’: शास्त्रीय संगीत का बेताज बादशाह

Tonk / सुरेश बुन्देल । सुनते हैं कि कलाकार, क्रिकेटर और पहलवान का बुढ़ापा खराब होता है। इसकी एक मिसाल रियासतकालीन राजगायक फैयाज हुसैन रागी को देखकर मिलती है, जो जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर मुफलिसी में मुब्तला नजर आते हैं और अपने आप से मायूस भी। प्राचीन काल से ही भारत में संगीत की …

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May 6, 2020 5:55 am

Tonk / सुरेश बुन्देल । सुनते हैं कि कलाकार, क्रिकेटर और पहलवान का बुढ़ापा खराब होता है। इसकी एक मिसाल रियासतकालीन राजगायक फैयाज हुसैन रागी को देखकर मिलती है, जो जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर मुफलिसी में मुब्तला नजर आते हैं और अपने आप से मायूस भी।

प्राचीन काल से ही भारत में संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। शास्त्रीय संगीत को ही संगीत की आत्मा माना जाता है। टोंक रियासत के सभी नवाबों ने अपने दौर में संगीत और संगीतज्ञों को खासी अहमियत दी। अन्तिम तीन नवाबों के शासन काल में ‘राज गायक’ की उपाधि हासिल करने वाले फैयाज हुसैन ‘रागी’ उम्र के अंतिम दौर में लकवाग्रस्त होकर अपनी बीमारी से जूझ रहे हैं। आज भी तालकटोरे के टीनशेड वाले घर में चारपाई पर लेटे- लेटे अपनी पुरानी यादों में खोए रहते हैं।

रागी की फनकारी के मुरीद रहे टोंक नवाब

1915 में टोंक के ही रहने वाले मशहूर सारंगीवादक उस्ताद तान मोहम्मद खां के घर में पैदा होने वाले फैयाज हुसैन को बचपन से ही संगीत से लगाव रहा। रागी ने हिन्दुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध मेवाती घराने के उस्ताद भुन्दु अली खां से गायन और वादन की तालीम बाकायदा हासिल की।

उनकी काबिलियत और गायिकी से प्रभावित होकर टोंक रियासत के पांचवें नवाब मोहम्मद सआदत अली खां ने उन्हें ‘संगीत रत्न’ का खिताब देते हुए राज गायक की उपाधि प्रदान की। इसके बाद छठे नवाब के तौर पर मसनदनशीं हुए मोहम्मद फारूख अली खां ने रागी की संगीत सेवाओं को देखते हुए उन्हें ‘संगीते- आजम’ और ‘सर से लेकर पांव तक संगीत’ करार दिया।

सातवें व अन्तिम नवाब मोहम्मद इस्माईल अली खां ने भी उन्हें ‘संगीत का बादशाह’ नामक खिताब दिया। संगीत के जानकार फैयाज हुसैन को शास्त्रीय संगीत का मुकम्मल गायक व संगीतकार मानते हैं। संगीत में प्रचलित प्रणाली ठुमरी, दादरा, धमार, ख्याल, गजल, गीत, मांड, टप्पा, तराना, कव्वाली और भजनों में रागी को महारत हासिल है।

हुसैन द्वारा गाया गया राग मालकोश का प्रसिद्ध गीत ‘देख आयो चैन, पिया को देखन चली मैं…।’ उस वक़्त लोग बार- बार सुना करते थे। आधुनिक युग में शास्त्रीय संगीत का प्रचलन कम होने लगा है। सुनने वालों की तादाद में भी कमी आई है। 105 बसन्त देख चुके रागी साहब का जलवा एक समय में देखते ही बनता था। हर खास और आम लोग उनकी गायिकी के दीवाने थे। रागी साहब ने अपने सैंकड़ों शिष्यों को हारमोनियम बजाना और गाना सिखाया

अब तक नहीं मिली सरकार से पर्याप्त मदद

रियासत काल में रागी साहब का रूतबा बतौर राज गायक हमेशा कायम रहा। किन्तु 10 साल से वे वे लकवाग्रस्त व अभावग्रस्त होकर जिस तरह का बदहाल जीवन जी रहे हैं, उस पर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है। संगदिल जमाने ने ना तो इनके फन की कद्र की और ना ही कभी सुध लेने की जहमत उठाई।

प्रशासनिक तौर पर भी किसी तरह का मान- सम्मान ना मिला और ना ही किसी प्रकार की सहायता। किसी स्वयंसेवी या कला संगठन ने भी संगीत की इस बेहद काबिल शख्सियत की इमदाद करने की कोशिश नहीं की। एक उम्मीद का चिराग मीडिया की जानिब से रोशन हो सकता था मगर ना तो उनके पास कोई खबरनवीस कलम लेकर पहुंचा और ना ही कोई कैमरामैन।

तालकटोरे के टूटे- फूटे घर में आज भी रागी साहब अपने 33 सदस्यों वाले बेटे- बहुओं, पोते- पोतियों वाले भरे- पूरे परिवार के साथ गुमनामी और गरीबी का जीवन जी रहे हैं। शायद आज भी उन्हें किसी से भी, किसी तरह मदद की उम्मीद नहीं है।

सुरेश बुन्देल- टोंक @कॉपीराइट

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