सियासत: भाजपा- कांग्रेस के अलावा जिले में अन्य पार्टियों का वजूद कुछ ख़ास नहीं ज़्यादातर की होती है जमानत जब्त, बामुश्किल मिल पाते हैं वोट

Tonk news / (भावना बुन्देल) समय- समय पर देश में अलग- अलग क्षेत्रीय पार्टियों का गठन होता रहा है और कुछेक राज्यों को छोड़कर क्षेत्रीय दल संसदीय लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल, स्वतंत्र और नेशनल कांफ्रेंस जैसी कुछ पार्टियां आजादी से पहले ही गठित हो चुकी थीं कितु ज्यादातर क्षेत्रीय …

सियासत: भाजपा- कांग्रेस के अलावा जिले में अन्य पार्टियों का वजूद कुछ ख़ास नहीं ज़्यादातर की होती है जमानत जब्त, बामुश्किल मिल पाते हैं वोट Read More »

October 20, 2020 5:04 am

Tonk news / (भावना बुन्देल) समय- समय पर देश में अलग- अलग क्षेत्रीय पार्टियों का गठन होता रहा है और कुछेक राज्यों को छोड़कर क्षेत्रीय दल संसदीय लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल, स्वतंत्र और नेशनल कांफ्रेंस जैसी कुछ पार्टियां आजादी से पहले ही गठित हो चुकी थीं कितु ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां देश के आजाद होने के बाद ही गठित हुई हैं।

सही मायनों में क्षेत्रीय दलों का विकास 1967 के बाद जोर पकड़ने लगा, जब स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इंडियन नेशनल कांग्रेस की पकड़ देश के मतदाताओं पर ढीली होने लगी। पिछले चार दशक से चुनावों के दरम्यान टोंक जिले में क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है। संगठन की दृष्टि से भी जिले में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव ना के बराबर है। ऐसी पार्टियों के झण्डे सिर्फ चुनावों में ही दिखाई देते हैं।

हालात इतने बुरे हैं कि उसके प्रत्याशियों को अपनी जमानत जब्त करानी पड़ती है। कई प्रत्याशी तो वोटों केे मामले में चार अंकों तक पहुंचने में भी नाकाम रहते हैं। हालांकि कई मर्तबा निर्दलिय प्रत्याशियों ने जरूर चुनावों में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है किन्तु उनका मकसद भी जीतना कम बल्कि हराना ज्यादा रहा है। कुछ प्रत्याशी जीतकर विधायक भी बने हैं।


2018 के विधानसभा चुनावों में अन्य दलों की जमकर फ़ज़ीहत


टोंक विधानसभा चुनाव में रिकार्ड मतों से जीतने वाले कांग्रेस के सचिन पायलट को 109040 और भाजपा के यूनुस खान को 54861 वोट मिले थे। इस मुकाबले में उतरे बसपा के मोहम्मद अली को 1785, शिव सेना के पांचू को 1221, बीजेएचपी के अमर सिंह चौधरी को 1052, निर्दलिय नीलिमा आमेरा को 735, आम आदमी पार्टी के रामपाल को 628, निर्दलिय राशेदा मजीद को 552 और एआरजेपी के मुकेश चौधरी को 207 वोट ही मिले थे। मालपुरा विधानसभा के चुनाव में भाजपा के कन्हैया लाल को 93237 और आरएलडी के रणवीर पहलवान को 63451 वोट मिले थे। इसके अलावा बसपा के नरेन्द्र सिंह आमली को 9836, निर्दलीय जीतराम को 2722, शिवसेना के राधेश्याम वैष्णव को 1309, जेजीपी के कल्याण सिंह कुरथल को 1260, एपीओआई के शशिपाल झारोटिया को 888, निर्दलीय पंकज दाधीच को 832, जद (एस) के सौरभ दीक्षित को 770, बीवाईएस के प्रहलाद गुर्जर को 678, निर्दलीय डॉ. राम नरेश सनाढ्य को 509, आम आदमी पार्टी के गिरिराज सिंह खंगारोत को 481, आईपीजीपी की पूजा जांगिड़ को 465, बीवीएचपी के डॉ. शिवदत्त शर्मा को 410 और कांग्रेस के दुर्गालाल को 321 वोट ही मिले थे।


निर्दलीयों की भी कोई ख़ास उपलब्धि नहीं रही


निवाई से कांग्रेस के प्रशांत बैरवा को 105784 और भाजपा के रामसहाय को 61895 वोट मिले थे। इसके अतिरिक्त बसपा के बनवारी को 1534, एपीओआई के नरेश कुमार अटल को 1345, बीजेएचपी के बाबूलाल बैरवा को 596 और और निर्दलीय पवन कुमार नवल को 521 वोट ही मिले थे। देवली- उनियारा से कांग्रेस के हरीश चंद्र मीणा को 95540 और भाजपा के राजेन्द्र गुर्जर को 74064 वोट मिले थे। वहीँ निर्दलीय उदय लाल गुर्जर को, 8876, बसपा के औमप्रकाश बैरवा को 3724, एआरजेपी के बद्री लाल शर्मा को 1088, निर्दलीय राजू को 894, एनयूजेडपी के सुरेन्द्र को 673, आम आदमी पार्टी के लड्डू लाल मीणा को 366 और बीवाईएस के बनवारी को 334 वोट ही मिले थे।
मतदाता जताते रहे हमेशा भाजपा- कांग्रेस में विश्वास
जिले के वोटरों ने अपवाद छोडक़र भाजपा और कांग्रेस को ही हमेशा सत्ता की चाबी सौंपी है। कमल व हाथ के अतिरिक्त वोटर अन्य कोई भी सिम्बल पहचानना भी पसन्द नहीं करते। एक दशक पूर्व हुए परिसीमन के बावजूद विधानसभा क्षेत्रों का जातीय समीकरण ज्यादा नहीं बदल पाया। प्रदेश के सर्वाधिक पिछड़ेपन का शिकार बना हुआ टोंक जिला जातीय गणित के मुताबिक ही वोट देता आया है। चारों विधानसभा सीटों के लिए कास्ट फैक्टर अनिवार्य शर्त है, जिसे दरकिनार कर प्रमुख पार्टियों द्वारा प्रत्याशी तय करना मुमकिन नहीं होता। मसलन जिला मुख्यालय की सीट पर कांग्रेस हमेशा मुस्लिम प्रत्याशी को ही अपना उम्मीदवार बनाती रही है। हालांकि टोंक विधानसभा क्षेत्र में गुर्जर वोटरों की तादाद भी बढ़ चुकी है, वहीं भाजपा ने अपना प्रत्याशी ज्यादातर जैन या बहुसंख्यक समुदाय से ही बनाया है। मोटे तौर पर हिन्दू- मुस्लिम कार्ड खेलना टोंक के लिए भाजपा और कांग्रेस की मजबूरी रही है, जिनके विधायक बारी- बारी से राज भी करते आए हैं। जिले में किसी भी क्षेत्रीय पार्टी का अधिक प्रभाव ना होना जिले में भाजपा व कांग्रेस की राह आसान कर देता है।

Prev Post

भीनमाल मे दो युवतियो से गैगरेप मामला,4 गिरफ्तार, कलेक्टर पहुंचे पीडिताओ के पास अस्पताल

Next Post

भीलवाड़ा कलेक्टर नकाते देर रात स्कूटर पर निकले किया शहर का दौरा

Related Post

Latest News

पटवारी 20 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथों अरेस्ट
राजकुमार शर्मा को ब्रेन हेमरेज
बीसलपुर की लाइन टूटी, 15 दिन बाद भी नही हुई ठीक

Trending News

कांग्रेस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे खड़गे,8 अक्टूबर को हो सकती घोषणा
राजस्थान के मंत्रियो व कांग्रेस विधायको को चेतावनी
NPS कार्मिक 01 अप्रैल 2022 के पश्चात NPS आहरण की राशि को पुनः 31 दिसंबर 2022 तक एकमुश्त अथवा अधिकतम 4 किस्तों में जमा करानी होगी
चिरंजीवी योजना में सहायता के लिए फोन 01482-232643 पर करे घंटी 2 घंटे में समाधान

Top News

टोंक जिला स्तरीय राजीव गांधी युवा मित्र प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित%%page%% %%sep%% %%sitename%%
Upload state insurance and GPF passbook in new version of SIPF
मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना से सुमन, रिजवाना बानो एवं दिनेश को मिली राहत
पटवारी 20 हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथों अरेस्ट
राजकुमार शर्मा को ब्रेन हेमरेज
बीसलपुर की लाइन टूटी, 15 दिन बाद भी नही हुई ठीक
Tonk: आवारा श्वान ने 7 लोगों को काटा, अस्पताल गए तो वहां भी नही हुई सार संभाल ,VIDEO 
IAS अतहर और डाॅ. महरीन आज बंधे शादी के बंधन में ,VIDEO
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मूल निवास प्रमाण पत्र बनवाने की जिम्मेदारी संस्था प्रधान की
पूर्व मंत्री और NCP नेता भुजबल का दुबई कनेक्शन का आरोप, FIR दर्ज