बसपा के लिए भीमसेना बन सकती चुनौति, चुनाव आते-आते गहलोत विरोधी होंगे नतमस्तक, पायलट / राजे ही…

एक समय था जब कांशीराम (kanshiram) के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के गलियारों से होकर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) को देश के दलित वर्ग ने अपनी खैर ख्वाह मान कर न केवल सिर आंखों पर बैठाया अपितु देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की सत्ता …

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June 15, 2021 11:34 pm

एक समय था जब कांशीराम (kanshiram) के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के गलियारों से होकर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने वाली बहुजन समाज पार्टी (BSP) को देश के दलित वर्ग ने अपनी खैर ख्वाह मान कर न केवल सिर आंखों पर बैठाया अपितु देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की सत्ता तक सौंप दी थी।

लेकिन वही बसपा धीरे धीरे तिलक तराजू और तलवार जैसा नारा देकर मात्र एक क्षेत्रीय पार्टी तक ही सिमट कर रह गयी, रही कसर काशीराम के बाद सर्वसर्वा बनी मायावती की पांच साल की सरकार ने पूरी कर दी ।

यही वो पांच साल थे जिसमें दलितों का नाम लेकर बनी सरकार में दलित ही विकास से वंचित रह गए और बसपा का स्वयं का मूल वोट बैंक आगे चलकर नगण्य रह गया ।

वैसे तो बसपा ने अपने क्षेत्रीय पार्टी के तमगे को राष्ट्रीय पार्टी में बदलने के भरसक प्रयास किये परन्तु उत्तर प्रदेश के अलावा बसपा देश के किसी भी हिस्से में अपना सम्मान जनक आधार नही बना पाई जिसका खामियाजा बसपा को केंद्रीय राजनीति में जबरदस्त उठाना पड़ा 543 सीटों वाली लोकसभा में आज बसपा के सांसद इकाई अंक से ऊपर नही उठ पाए ।

राजस्थान में 2008 से 2013 के अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) शासन में बसपा के 200 मैसे 6 विधायक जीते थे जो बाद में विधायक राजेन्द्र सिंह गुढ़ा के नेतृत्व में कांग्रेस की शरण मे चले गए जिसका लाभ राजेन्द्र सिंह गुढ़ा (Rajendra Singh Gudha) को पर्यटन विभाग (tourism department) का राज्य मंत्री बना कर दिया गया ।

वर्तमान में गहलोत ने वापस वही पुराना दाव खेला है एक बार पुनः राजस्थान से बसपा के विधायकों ने मायावती को टाटा बोलकर गहलोत सरकार में उपस्थिति दर्ज करवा दी हालांकि इस बार सभी विधायक ढाई साल तक खामोश रहे और बोले तो ऐसे समय मे बोले है कि पूर्व  डिप्टी सीएम सचिन पायलट (Sachin Pilot) और गहलोत (Gehlot) की रस्साकशी में बसपाइयों की बुलन्द आवाज पायलट के लिए किसी बेसुरे राग से कम नही ।

शेखावाटी अंचल के गुढ़ा गांव के मूल निवासी राजेन्द्र सिंह का परिवार लंबे समय से राजनीति में है राजेन्द्र सिंह का यह खेला भले ही गहलोत के खिलाफ नजर आता हो परन्तु राजनीतिक बिसात पर बिछी इस ड्रामे की रंगत गहलोत के सपनो को ओर रंगीन बनाएगी ।

राजेन्द्र सिंह का इशारा साफ है कि गहलोत सरकार बिना बसपाइयों के अल्प मत में है और पायलेट के दबाव में यदि सरकार या आला कमान कुछ निर्णय लेते है जिसका प्रतिकूल असर बसपाइयों पर पड़ता है तो फिर बसपाई चुप न बैठेंगे । यह तो हुई तस्वीर के पहले पहलू की बात अब इसके दूसरे पहलू पर भी नजर डाल लेते है क्या वाकई गहलोत सरकार इन बसपाइयों के बिना अल्प मत में आ जायेगी यह आप स्वयं देख लीजिए वर्तमान सरकार में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 100 है जिसमे 6 विधायक बसपा के मिल जाने से आज कांग्रेस 106, भाजपा 76, निर्दलीय 13 है पिछले लोक डाउन के बाद गहलोत सरकार पर अचानक संकट के बाद छा गए और उसके 19 विधायक भूमिगत हो गए ।

उस वक्त 13 निर्दलीयों के साथ 6 बसपाइयों को लिए राजेन्द्र गुढ़ा ही सरकार के संकट मोचक बने थे और एक बेमतलब के ड्रामे के बाद इसका पटाक्षेप स्वतः ही हो गया और सरकार स्तर हो गयी लेकिन हाल ही में जैसे ही पायलट के भाजपा में जाने के समाचार वाट्सप यूनिवर्सिटी के तैराकों ने सोशल मीडिया में तैराये तो एक बार फिर राजेन्द्र गुढ़ा संकट मोचक की भूमिका में नजर आ रहे है, मतलब साफ है मंत्री मंडल विस्तार के नाम पर गुढ़ा का आक्रोशित होना एक संकेत मात्र है कि यदि इस विस्तार में बसपाइयों को अरजेस्ट न किया तो

मामला बिगड़ सकता है जिसका फायदा गहलोत उठा कर आला कमान के सामने यह कह सकते है कि पायलेट यदि सारी शर्ते मान ली तो सरकार अस्थिर हो जाएगी बस गहलोत साहब का हो गया काम ।

बहरहाल मंत्री मंडल विस्तार कुछ समय के लिए टल गया वंही सचिन ने मीडिया को यह कह कर कि वो सचिन पायलट न होकर तेंदुलकर होंगे मामले पर ठंडा पानी डाल दिया । खैर हम बात बसपा के अस्तित्व की कर रहे है दो चुनावों में बसपा 6-6 सीटे लेकर अपनी उपस्थिति तो दर्ज करवा चुकी

लेकिन भविष्य की इमारत को काफी हद तक जर्जर हालत में पहुंचा चुकी है, वर्तमान 6 विधायकों में राजेन्द्र गुढ़ा को छोड़कर ऐसा कोई विधायक नही जिसे कांग्रेस आगामी चुनावों में टिकट देकर मैदान में भेज दे वंही दूसरी तरफ बसपा के बढ़ते जनाधार की कल्पना तो दूर मूल वोट बैंक को चन्द्र शेखर रावण की भीम सेना भारी नुकशान पहुँचा चुकी है।

आने वाले समय मे एकेले उत्तर प्रदेश में भीम सेना बसपा के समकक्ष या बेहतर विकल्प बन जायेगा और यह कोई जादू नही है बल्कि एक सोची समझी रणनीति और राजनीति के तहत किया गया चमत्कार है ।

आगामी विधान सभा चुनाव 2023 को लेकर कांग्रेस भाजपा की तैयारिया शुरू हो चुकी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को जादूगर के नाम से भी शौहरत हासिल है और मेरा मानना है कि यह जादूगर चुनाव आते आते अपने तमाम विरोधियों को या तो जमीं दोज कर देगा या फिर सारे विरोधी शरणागत होंगे ।

बसपा का गिरता ग्राफ उसे उत्तर प्रदेश से ही बाहर नही निकलने देगा ऐसे में दलित राजनीति को लेकर चर्चा में आये रावण के दिन फिरने की पूरी पूरी संभावना है हालांकि राजस्थान में दलित वर्ग ने अभी तक अपने आपको कांग्रेस/भाजपा का ही वोटर बनाये रखा है भीम सेना को इस वर्ग को कोर वोटर बनाने के लिए भारी भरकम प्रयासों की जरूरत पड़ेगी ।

लेकिन जिस तरह से 2 अप्रैल 2019 का स्वयं भू भारत बंद ने एक संकेत दिया है कि यह वर्ग राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक तो है लेकिन नेतृत्व की अनुपस्थिति के चलते इनका दोहन या यूं कहें कि राजनीति शोषण ज्यादा हो रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी ।

बहरहाल भीम सेना के प्रारंभिक दौर में लगे जय भीम, जय मीम के नारों का अब कोई महत्व या असर हाल फिलहाल तो नजर आता नही है ऐसे में राजस्थान की राजनीति में तीसरा विकल्प सिर्फ इन दो बड़ी पार्टियों से रुष्ट या निष्काशित कोई बड़ा नेता ही खड़ा कर सकता है और वर्तमान में कांग्रेस में उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट और भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की अनदेखी से उत्पन्न परिस्थितियों ने ऐसे संकेत जरूर दिए है कि अगर यह खेल लम्बा चला तो आगामी विधान सभा चुनावों में राजस्थान की राजनीति अपना स्वयं का पांच दशकों पुराना रिकार्ड तोड़ लेगी ।

✍️ अबरार अली बेरी {ग्रुप एडिटर राजस्थान मेघदूत}

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