राजस्थान में वसुंधरा गुट को पटखनी देता शाह खेमा

  जयपुर। राजस्थान में विधानसभा चुनावों के रणभेरी बजते ही अब बडे नेताओं ने अपनी दुश्मनी निकालने का रास्ता भी निकाल लिया है। इन चुनावों के बीच ही शाह खेमा वसुंधरा गुट को पटखनी देेने में जुट गया है। पिछले काफी दिनों से मीडिया और सत्ता के गलियारों में इस उठापटक को महसूस भी किया जा …

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October 22, 2018 1:40 pm

 

जयपुर। राजस्थान में विधानसभा चुनावों के रणभेरी बजते ही अब बडे नेताओं ने अपनी दुश्मनी निकालने का रास्ता भी निकाल लिया है। इन चुनावों के बीच ही शाह खेमा वसुंधरा गुट को पटखनी देेने में जुट गया है। पिछले काफी दिनों से मीडिया और सत्ता के गलियारों में इस उठापटक को महसूस भी किया जा रहा था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा रहा है कि गत दिनों विधानसभा चुनाव के प्रभारी  प्रकाश जावड़ेकर से राज्य में टिकट बंटवारे को लेकर पूछा गया था
जावड़ेकर ने कहा कि पार्टी का चेहरा वसुंधरा राजे ही हैं वोट भी नरेंद्र मोदी और राजे के नाम पर ही मांगे जाएंगे लेकिन जिनके लिए वोट मांगे जाएंगे उन्हें तय करेंगे ‘हम’। यानी समझा जाए कि उम्मीदवारों के चयन का जिम्मा सिर्फ वसुंधरा राजे के पास नहीं होगा।
गौरव यात्रा में सक्रिय रही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मीडिया के परिदृश्य से गायब सी हो गई हैं, इससे कयास लगाए जा रहे हैं कि राजस्थान में बड़े नेता ही बीजेपी को हराने में जुट गए हैं।
सितंबर का पूरा महीना कर्मचारियों की हड़ताल में कुर्बान हो गया था कर्मचारियों को अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए यही मुफीद समय लगा था कोई भी सरकार कम से कम चुनाव के समय अपने लाखों कर्मचारियों की नाराजगी का रिस्क नहीं ले सकती। लेकिन बीजेपी जानबूझकर कर्मचारियों की नाराजगी का रिस्क ले रही है, यह भी एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया कार्य है।
राजस्थान में सरकारी कर्मचारियों का प्रभाव है, आज भी अनगिनत लोग वोट डालने से पहले गांव के ‘मास्साब’ (टीचर), ‘डॉक्स्साब’ (डॉक्टर) या ‘कंपोडर साब’ (नर्सिंग स्टाफ) से सलाह जरूर लेते हैं। वसुंधरा राजे सरकार ने कर्मचारियों को अपने हाल पर छोड़ दिया रोडवेज कर्मचारियों को बता दिया गया है कि सातवें वेतन आयोग को लागू करने की उनकी मांग को नहीं माना जा सकता है।
यहां तक कि जयपुर में चलने वाली लो-फ्लोर बस सर्विस के कई ड्राइवर-कंडक्टरों को तो सस्पेंड तक कर दिया गया।सस्पेंशन और सख्ती के डर से फिलहाल ये कर्मचारी काम पर लौट गए लेकिन कर्मचारी संगठनों ने कसम खा ली कि चुनावों में भाजपा को सबक सिखाया जाएगा।
दरअसल, वसुंधरा राजे और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के बीच सबकुछ ठीक नहीं है, पहले प्रदेश अध्यक्ष को लेकर मामला गर्माया। किसी तरह सुलझा तो अमित शाह और वसुंधरा राजे के अलग-अलग कार्यक्रमों पर लोगों का ध्यान गया और फिर जिस तरह अमित शाह ने अपनी टीम को राजस्थान में सक्रिय किया है, उसने भी वसुंधरा को खासा धक्का पहुंचाया है।
राजस्थान प्रभारी के रूप में वसुंधरा राजे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की नियुक्ति चाह रही थी, लेकिन पार्टी ने प्रकाश जावडेकर को लगा दिया। इससे पहले, अमित शाह ने राजे विरोधी ओम माथुर को भी अघोषित रूप से राजस्थान में ‘इन्वॉल्व’ कर दिया है (प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी भी माथुर गुट के ही माने जाते हैं) बाद में टिकटों का फैसला करने के लिए शाह ने केंद्रीय मंत्रियों गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुन मेघवाल को अहम जिम्मा सौंप दिया।

कुल मिलाकर अब टिकट वितरण में वसुंधरा राजे या उनके गुट की नहीं चलेगी। 2003 और 2013 के चुनावों में टिकट वितरण का पूरा काम वसुंधरा राजे के निर्देशन में ही किया गया था। बताया जा रहा है कि इससे राजे गुट को इस बार जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री बदले जाने की आशंका हो गई है राजनीति का एक सिद्धांत ये भी है कि अगर थाली आपके आगे से हटाने की कोशिश की जा रही हो तो उसे बिखेर दें, इससे पहले कि वो दूसरे के सामने सजाई जाए।

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