दुष्कर्म पीड़िता करा सकती है गर्भपात,शादी से पहले गर्भवती होना मानसिक तनाव- सुप्रीम कोर्ट 

Dr. CHETAN THATHERA
5 Min Read

जयपुर/ सुप्रीम कोर्ट ने देश मे दुष्कर्म और गैंगरेप से गर्भवती होने वाली लडकियों और महिलाओं को राहत देते अपने एक महत्वपूर्ण फैसले मे दुष्कर्म व गैंगरेप पीडिताओं को गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है इसे यूं कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी की अब ऐसी पीडिताएं गर्भपात करा सकेगी । सुप्रीम कोर्ट का मानना और कहना है की है कि शादी से पहले गर्भवती होना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। 

इस मामले मे पीड़िता को गर्भवती हुए 27 सप्ताह से अधिक का समय हो गया है।पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट पर ध्यान देते हुए जस्टिस बी वी नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट द्वारा पीड़िता को गर्भपात नहीं कराने का आदेश देना सही नही था।

शादी से पहले हानिकारक…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह के बाद गर्भावस्था न केवल जोड़े के लिए बल्कि परिवार और दोस्तों के लिए भी खुशी और जश्न का कारण है। इसके विपरीत शादी से पहले गर्भावस्था हानिकारक है, विशेष रूप से यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के मामलों में और गर्भवती महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले तनाव और आघात का कारण है। एक महिला का यौन उत्पीड़न अपने आप में चिंताजनक है और ऐसे में गर्भवती हो जाना और चिंता में डाल देता है।

भ्रूण जिंदा मिला तो…

पीठ ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट के मद्देनजर हम पीड़िता को गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देते हैं। आगे कहा कि यदि भ्रूण जीवित पाया जाता है, तो अस्पताल भ्रूण के जीवित रहने को सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक सहायता देगा। यदि यह जीवित रहता है, तो राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा कि बच्चे को गोद लिया जाए।

क्या है नियम

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत, गर्भावस्था को समाप्त करने की ऊपरी सीमा विवाहित महिलाओं, दुष्कर्म से बचे लोगों सहित विशेष श्रेणियों और अन्य कमजोर महिलाओं जैसे कि विकलांग और नाबालिगों के लिए 24 सप्ताह है।

हाईकोर्ट को लगाई थी फटकार

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता से जुड़े एक मामले में आदेश देने पर गुजरात हाईकोर्ट को फटकार लगाई थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि किसी भी अदालत द्वारा किसी वरिष्ठ अदालत के फैसले के खिलाफ आदेश पारित करना संविधान के खिलाफ है।

मामला यह है

एक दुष्कर्म पीड़िता ने गर्भपात कराने की इजाजत मांगी थी, जिस पर गुजरात हाईकोर्ट ने शनिवार को उसे राहत देने से इनकार कर दिया था। इस पर पीडिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सोमवार के लिए सूचीबद्ध किया था। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को एक विशेष बैठक में पीड़िता की गर्भावस्था को समाप्त करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसकी दोबारा मेडिकल जांच का आदेश दिया था और अस्पताल से 20 अगस्त तक रिपोर्ट मांगी थी।

देश की अदालत सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ नही जा सकती 

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने शनिवार को एक आदेश की जानकारी मिलने के बाद कहा कि गुजरात हाईकोर्ट में क्या हो रहा है? भारत में कोई भी अदालत सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ नहीं जा सकता। यह संविधान के खिलाफ है।

 

गुजरात सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शनिवार का आदेश केवल लिपिकीय त्रुटि को ठीक करने के लिए पारित किया गया था। उन्होंने कहा कि पिछले आदेश में एक लिपिकीय त्रुटि थी और उसे शनिवार को ठीक कर दिया गया था। यह एक गलतफहमी थी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के रूप में हम न्यायाधीश से आदेश को वापस लेने का अनुरोध करेंगे।

यह तब हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर निर्णय लेने में उच्च न्यायालय द्वारा की गई देरी को हरी झंडी दिखाई और कहा कि मूल्यवान समय बर्बाद हो गया है। इसके बाद जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की पीठ ने कहा कि वे इस मामले पर आज सुनवाई करेंगे। उच्च न्यायालय के असंवेदनशील रवैये की आलोचना करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को गुजरात सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया और महिला की याचिका पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी थी ।

Share This Article
Follow:
चेतन ठठेरा ,94141-11350 पत्रकारिता- सन 1989 से दैनिक नवज्योति - 17 साल तक ब्यूरो चीफ ( भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़) , ई टी राजस्थान, मेवाड टाइम्स ( सम्पादक),, बाजार टाइम्स ( ब्यूरो चीफ), प्रवासी संदेश मुबंई( ब्यूरी चीफ भीलवाड़ा),चीफ एटिडर, नामदेव डाॅट काम एवं कई मैग्जीन तथा प समाचार पत्रो मे खबरे प्रकाशित होती है .चेतन ठठेरा,सी ई ओ, दैनिक रिपोर्टर्स.कॉम