राजस्थान में फिर से हलचल ,गहलोत सरकार में विद्रोह की चिंगारी दिल्ली तक पहुंची, सचिन पायलट खेमे के विधायकों की अनदेखी आरोंप

जयपुर। प्रदेश की चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव से पहले सत्तारूढ़ गहलोत सरकार में विद्रोह की चिंगारी सुलगने लगी है। पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट खेमे के विधायकों को कांग्रेस आलाकमान की ओर से सुलह के दौरान दिए गए आश्वासन की पालना में हो रही देरी और अब कथित रूप से विधायकों की अनदेखी के कारण विद्रोह की चिंगारी की आंच दिल्ली तक पहुंच गई है।

विधानसभा में माइक के मामले में एसएसी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक विधायकों की अनदेखी के विधायक रमेश मीणा आरोप लगा चुके है। इसके बाद पायलट खेमे के विधायक मुरारी मीणा और वेदप्रकाश सोलंकी भी उनके समर्थन में आ गए हैं। तीनों ही विधायक सरकार और मंत्रियों पर विकास कार्यों में अनदेखी को लेकर सीधा हमला बोल रहे है।

 

इन बयानों के बाद कांग्रेस में सियासी हलचल बढ़ गई है। भेदभाव और पार्टी के कमजोर होने को लेकर पायलट कैंप के विधायकों की ओर से राहुल गांधी से मिलकर उनके समक्ष अपनी बात रखने की बात कही गई है। पायलट खेमे के विधायकों के निशाने पर आए मुख्य सचेतक महेश जोशी भी अंदरखाने खुद को टारगेट बनाने से नाराज हैं और अपनी नाराजगी को लेकर वे दिल्ली पहुंचे हैं, जहां वे प्रदेश प्रभारी अजय माकन से मिलकर अपनी बात रखेंगे।

विधानसभा में सीट निर्धारण और सीट पर माइक नहीं होने को लेकर विधायक रमेश मीणा व वेद प्रकाश सोलंकी ने जोशी को निशाने पर लिया था। दोनों विधायकों ने कहा था कि एससी-एसटी और मॉइनोरिटी विधायकों का सीट निर्धारण में महेश जोशी ने ध्यान नहीं रखा, साथ ही जानबूझकर कई विधायकों को बार-बार सदन में मौका दिया जाता है, जबकि एससी-एसटी और मॉइनोरिटी के विधायकों की सीटों पर माइक तक की व्यवस्था तक नहीं है।

पायलट खेमे के तीनों विधायकों की ओर से की जा रही बयानबाजी को लेकर प्रदेश नेतृत्व गंभीर तो है, लेकिन बयानबाजी का जवाब देने के पक्ष में नहीं है। बताया जा रहा है कि प्रदेश नेतृत्व की ओर से पीसीसी के नेताओं को साफ संदेश दिया गया है कि वे किसी भी तरह से बयानबाजी का जवाब नहीं दें। तीनों विधायकों की ओर से की गई बयानबाजी की रिपोर्ट और वीडियो फुटेज तैयार कर दिल्ली भेजने को कहा गया है।

प्रदेश की राजसमंद, सहाड़ा, वल्लभनगर तथा सुजानगढ़ विधानसभा सीटों पर वर्तमान विधायकों के निधन के कारण उपचुनाव प्रस्तावित है। इनमें से राजसमंद सीट को छोडक़र शेष तीनों सीटें कांग्रेस के पास थी। ऐसे में उपचुनाव के पहले हो रही यह सियासी बयानबाजी पार्टी के लिए अनुचित मानी जा रही है। सियासी जानकारों का कहना है कि इससे जनता में अच्छा मैसेज नहीं जाएगा।