राजस्थान मे राजपुत-कायमखानी गठजोड़ अस्सी के दशक के बाद कमजोर पड़ने लगा!

।अशफाक कायमखानी। जयपुर। राजपूत चोहान वंश के मोटेराव चोहान के पुत्रो के इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उनके वंशजो को कायमखानी बीरादरी के नाम से जाना जाता रहा है। राजपूत व कायमखानी का खून, रहन-सहन व वेश भूषा एक सी होने के कारण सामाजीक सिस्टम मे एक दूसरे के काफी भाईपा जैसा होने के कारण …

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April 22, 2018 5:50 am

।अशफाक कायमखानी। जयपुर। राजपूत चोहान वंश के मोटेराव चोहान के पुत्रो के इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उनके वंशजो को कायमखानी बीरादरी के नाम से जाना जाता रहा है। राजपूत व कायमखानी का खून, रहन-सहन व वेश भूषा एक सी होने के कारण सामाजीक सिस्टम मे एक दूसरे के काफी भाईपा जैसा होने के कारण प्रदेश मे आजादी के काफी सालो तक सियासी तौर पर आपसी एकजुटता बनी रही। पहले महारानी गायत्री देवी की कयादत वाली स्वतंत्र पार्टी के नाम पर फिर कुछ समय बाद 1980-85 तक कल्याण सिंह कालवी के अगुवाई वाली जनता पार्टी के नाम यह दोनो बिरादरी अलग अलग धर्म को मानने के बावजूद पहले महारानी गायत्री देवी व फिर कल्याय सिंह कालवी पर भरोषा जताते हुये अक्सर आपसी ऐकजुटता की ताकत के बल पर एक मजबूत सियासी गठबंधन के तौर पर जाने जाते रहे है।
हालाकि फतेहपुर से आलम अली खा व डीडवाना से उम्मेद सिंह के साथ साथ अनेक कायमखानी-राजपूत एक दुसरे के सहयोग से पहले स्वतंत्र पार्टी के नीसान पर पर जनता पार्टी के नीसान पर विधायक बनते रहे। 1972-मे सीकर से तत्तकालीन मंत्री व कांग्रेस के कद्दावर नेता रामदेवसिंह महरिया की स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार ठाकूर गोरधन सिंह से हारने के पीछे भी प्रमुख कारण राजपूत-कायमखानी गठजोड़ की ही प्रमूख भुमिका रही है। इसी तरह 1979 के आम लोकसभा चुनाव मे झूंझुनू से जनता पार्टी के ठाकूर भीवंसिंह मण्डावा के सांसद बनने व चूरु से आलम अली खां के मामूली मतो से लोकदल के उमामीदवार सारण से चुनाव हारने पर भी प्रमूख भूमिका राजपूत-कायमखानी मतो का एक साथ मतदान होना माना जाता है।
1977-के चुनाव मे स्वतंत्र पार्टी का एक तरह से वजूद खत्म होने व साझा सरकार के मूल रुप से जनसंघ के नेता भेरोसिंह शेखावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद उक्त दोनो बीरादरी के गडजोड़ मे मामूली जो दरार आई थी। वो 1980 मे जनता पार्टी के टूटन के बाद भारतीय जनता पार्टी का अलग से गठन होकर उसके प्रमुख नेता भेरोसिंह शेखावत के होने पर राजपूत समाज का झूकाव भाजपा की तरफ होने लगा। एवं उस समय तक स्वतंत्र पार्टी का खातमा होना एवं जनतादल सरकार के समय राजपूत नेता कल्याणसिंह कालवी का निधन होने के बाद से कायमखानी समाज भी धिरे धिरे राजपूत समाज से दूर होकर अपना अलग से सियासी वजूद कायम रखने के लिये जाट समाज से हाथ मीला कर जटू-कटू एक होने की कहावत चरितार्थ करने लगे।
कुल मिलाकर यह है कि सियासी तौर पर राजपूत व कायमखानी बीरादरी के रास्ते अलग अलग होने के बावजूद यह दोनो बीरादरी एक दूसरे के पक्ष मे आज भी सरलता से मतदान करने मे हिचकते नही है। शेखावाटी जनपद मे भाजपा के निसान पर कायमखानी चुनाव लड़ने व अनेक जगह भाजपा को वोट देने से दूर भागने की कतई कोशिश नही करते है। लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आज दोनो बीरादरीयो मे वो गठजोड़ नही है जो 1967-77 के मध्य बना हुवा था।

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