राजे क्या प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को स्वीकार करेंगी

जयपुर।(सत्य पारीक)मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस बार प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पार्टी हाईकमान को नाकों चने चबाएगी या स्वयं चाबेगी ? क्योंकि उनकी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष को नियुक्त करना पार्टी हाईकमान नहीं चाहती जबकि पार्टी हाईकमान के पसंद का प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा को स्वीकार नहीं , इस बात को लेकर दोनों में शीत युद्ध चरम सीमा पर है , पार्टी हाईकमान ने राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट के परिणाम भाजपा के विपरीत आने पर प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी से इसकी जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र देने की कहा था , लेकिन मुख्यमंत्री के सलाह से परनामी ने हाईकमान के आदेश की अनदेखी की । इसी कारण 4 दिन पहले परनामी को बर्खास्त कर दिया गया जबकि दिखावट के लिए परनामी ने प्रेस को बताया कि उन्होंने निजी कारणों से पद से त्यागपत्र दिया है

 

प्रणामी को पद से बर्खास्त करना वसुंधरा राजे की पहली शिकस्त मानी जा रही है , जबकि दूसरी शिकस्त के रूप में उनकी पसंद के खिलाफ किसी नेता का प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नियुक्त करना होगी , इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि पार्टी हाईकमान नहीं चाहती की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे राजस्थान में विधानसभा चुनाव जीतकर पुन मुख्यमंत्री पद का दावा पेश ना कर सके , फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं उन से स्पष्ट है कि वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा को चुनावी सफलता मिलना संभव नहीं है , इसी कारण पार्टी हाईकमान किसी राजपूत नेता को नेतृत्व देकर विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है जो स्पष्ट संकेत वसुंधरा को राजनीति से अलग-थलग करना है

उल्लेखनीय है कि जब भाजपा सत्ता में नहीं थी तब वसुंधरा राजे को विरोधी दल के नेता पद से हटाया गया था तब उन्होंने अपने निवास पर जमकर शक्ति प्रदर्शन किया और हाईकमान को मजबूर कर दिया था इसी कारण उन्हें दोबारा विरोधी दल के नेता पद पर नियुक्त करना पड़ा , ऐसे ही जब विधानसभा के चुनाव नजदीक आए तब वसुंधरा ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए मांग की , लेकिन हाईकमान ने आनाकानी की तो वसुंधरा ने फिर एक बार अपने निवास पर शक्ति प्रदर्शन करते हुए कई दिनों तक यह एहसास दिलाया की प्रदेश भाजपा कि वही एक नेता है जिनके नेतृत्व में सरकार बनाई जा सकती है इस कारण एक बार फिर हाईकमान को मजबूर होकर वसुंधरा को प्रदेशाध्यक्ष का पद सौंपना पड़ा , इसी पद के कारण वे पुनः मुख्यमंत्री बनी और चुनोती दे डाली कि उन्ही के नेतृत्व में 163 सीटें जो नरेन्द्र मोदी को अखर गई क्योंकि पूरे देश में उस समय मोदी लहर थी ।

जब केंद्र में प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर अमित शाह नियुक्त हुए तब वसुंधरा राजे को ओम माथुर के साथ संदेश भेजा गया कि वे मुख्यमंत्री का पद त्याग कर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो जाएं , लेकिन वसुंधरा ने इसे अस्वीकार करते हुए लगभग 113 भाजपा विधायकों के एफिडेविट हाईकमान को पेश करते हुए कहा कि वे इनके दम पर नई पार्टी बनाकर भाजपा को राजस्थान से साफ कर देगी , वसुंधरा के इस राजनीतिक चुनोती के आगे मोदी और शाह नतमस्तक हो गए और उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहने देने के इलावा कोई चारा नहीं दिखाई दिया जो वसुंधरा राजे की विजय ओर मोदी शाह की राजनीतिक पराजय थी ।

जब केंद्र में मोदी मंत्रिमंडल का गठन किया जा रहा था तब वसुंधरा ने अपने सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल करने की मांग की , इस पर मोदी ने असहमति दिखाइए और पार्टी में यह नियम लागू कर दिया किसी भी परिवार के दो नेता को मंत्री पद का लाभ नहीं मिलेगा इस नियम के तहत अनेक नेता मंत्री पदों से वंचित रह गए लेकिन आखिरकार उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव मोदी ने अपने नियम को दरकिनार कर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र उत्तर प्रदेश में मंत्री पद सौंप दिया इस घटना के बाद वसुंधरा ने एक बार फिर अपने पुत्र के लिए कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली , अब प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति पर फिर मोदी-शाह का राजनीतिक मुकाबला राजे से है , देखना है बाजी किसके हाथ लगेगी , राज्य भजपा का भविष्य इसी निर्णय पर टिका है ।