जयपुर, जोधपुर व कोटा निगम को कांग्रेस-भाजपा ने बनाया प्रतिष्ठा का प्रश्न

Jaipur News । राजस्थान के तीन शहरों में शहरी सरकार बनाने को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम को शहरों की बढ़ती जनसंख्या जरूरतों और विस्तार को ध्यान में रखते हुए दो-दो भागों में बांट दिया गया है। अब जब चुनाव की सारी तैयारियां हो गई हैं, भाजपा और …

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October 25, 2020 6:06 pm

Jaipur News । राजस्थान के तीन शहरों में शहरी सरकार बनाने को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम को शहरों की बढ़ती जनसंख्या जरूरतों और विस्तार को ध्यान में रखते हुए दो-दो भागों में बांट दिया गया है। अब जब चुनाव की सारी तैयारियां हो गई हैं, भाजपा और कांग्रेस ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। इन चुनावों में प्रदेश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों के लिए प्रत्याशी तय करना टेढ़ी खीर साबित हुआ, जिन्हें टिकट नहीं मिला वे बागी होकर इस बार भी दोनों दलों की मुसीबत बढ़ा रहे हैं। ऐसे में जयपुर, जोधपुर और कोटा के नगर निगम चुनाव दोनों बड़े राजनीतिक दलों की साख पर बने हुए हैं।


जयपुर नगर निगम :

 जयपुर निगम की स्थापना 1994 में हुई थी। यहां बने 5 बोर्ड में 4 बार भाजपा व 1 बार कांग्रेस काबिज रही। जयपुर नगर निगम को इस बार दो भागों में बांटा गया है। इनमें हैरिटेज निगम 100 वार्ड और ग्रेटर निगम 150 वार्ड का है। यहां पहले चुनाव में भाजपा के मोहन लाल गुप्ता को मेयर चुना गया। उन्होंने 1994 से 1999 तक मेयर का 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद 1999 में जयपुर मेयर पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित हुआ। भाजपा की निर्मला वर्मा मेयर तो बनी लेकिन बीच कार्यकाल में ही उनका निधन हो गया। इसके बाद भाजपा की ही शील धाभाई मेयर बनी। वर्ष 2004 से 2008 तक भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी मेयर बने। इसी दौरान विधायक बनने पर डिप्टी मेयर पंकज जोशी पांचवें मेयर चुने गए। इसके बाद प्रक्रिया में बदलाव हुआ और सीधे चुनाव के नियम से कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल मेयर चुनी गई। वर्ष 2013 में भाजपा की सरकार आई तो मेयर के सीधे चुनाव का नियम हटा दिया गया। 2014 से 2019 के 5 साल के कार्यकाल में तीन-तीन मेयर बने। भाजपा के निर्मल नाहटा इस दौरान जयपुर के सातवें मेयर चुने गए थे, लेकिन पार्टी की आंतरिक खींचतान के चलते नाहटा को 2 साल बाद इस पद से हटा दिया गया। नाहटा के बाद अशोक लाहोटी मेयर बने, जिनके विधायक बनने के बाद इसी बोर्ड में तीसरा मेयर चुना जाना था। इस दौरान अंदरूनी कलह के चलते ये पद भाजपा के हाथ से निकल गया। पार्टी ने मनोज भारद्वाज को मेयर प्रत्याशी बनाया था, लेकिन भाजपा से ही पार्षद विष्णु लाटा ने पार्टी से बगावत करते हुए मेयर का पर्चा भी भरा और 1 वोट से वो विजयी भी हुए।
अब मेयर पद के लिए यहां दोनों निगमों में ओबीसी की महिला प्रत्याशी के लिए सीट रिजर्व है। दोनों नगर निगमों में यूं तो ओबीसी महिला के लिए 18 वार्ड ही आरक्षित हैं, लेकिन सामान्य, सामान्य महिला और ओबीसी सामान्य के कोटे से भी ओबीसी महिला चुनाव जीतकर महापौर बन सकती हैं। सरकार का हाइब्रिड फार्मूला भी लागू है। 


कोटा नगर निगम : 

कोटा निगम की स्थापना 1994 में हुई थी। यहां बने 5 बोर्ड में से भी 4 बार भाजपा व 1 बार कांग्रेस काबिज रही है। कोटा शहर को इस बार 2 नगर निगमों कोटा उत्तर में 70 वार्ड और कोटा दक्षिण 80 वार्ड में बांटा गया है। कोटा नगर निगम 1994 में बना, तब परसराम मदेरणा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। उधर, भुवनेश चतुर्वेदी हाड़ौती की राजनीति में कांग्रेस का बड़ा चेहरा थे। दोनों के बीच टिकट वितरण को लेकर रस्साकशी चली। इसके चलते कांग्रेस की सूची जारी तो हुई, लेकिन प्रत्याशियों को सिंबल नहीं मिल पाए। ऐसे में बिना पार्टी सिंबल के ही कांग्रेस प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा। नतीजा ये रहा कि भाजपा ने आसानी से अपना बोर्ड बना लिया। भाजपा ने ये चुनाव दाऊदयाल जोशी और ललित किशोर चतुर्वेदी के नेतृत्व में लड़ा था। कोटा निगम बनने के बाद शहर की पहली मेयर बनी सुमन श्रृंगी। इसके बाद के 2 बोर्ड में भी भाजपा के 1999 में ईश्वर लाल साहू तो 2004 में मोहनलाल महावर महापौर बने। वर्ष 2009 में कांग्रेस की सत्ता थी। इस दौरान हुए निगम चुनाव भाजपा की अंर्तकलह की भेंट चढ़ गए। प्रत्याशियों ने गलत टिकट बांटने का आरोप लगाते हुए बगावत कर दी। बागी मैदान में कूद पड़े। इसका फायदा कांग्रेस को मिला। कांग्रेस और निर्दलीयों ने 60 में से 42 सीटें बटोरी। मेयर के सीधे चुनाव में कांग्रेस की रत्ना जैन मेयर चुनी गई और भाजपा के खाते में महज 9 सीटें आईं। वर्ष 2014 में हुए परिसीमन में 5 वार्ड बढ़ा दिए गए। मोदी लहर के चलते 2014 के निगम चुनाव में भाजपा ने 65 में से 53 वार्ड पर कब्जा जमाया। कांग्रेस और निर्दलीयों को छह-छह सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। हाड़ौती में जिस तरह से जनसंघ का दबदबा था, उसे भाजपा ने भी बनाए रखा। कांग्रेस ने कई बार भाजपा को टक्कर तो दी लेकिन हर बार पिछड़ती रही। 2009 में सीधे मेयर के चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त हासिल की थी, लेकिन 2014 के चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली और उनके केवल 65 में से 6 ही प्रत्याशी जीतकर नगर निगम पहुंच पाए।


जोधपुर नगर निगम :

 जोधपुर निगम की स्थापना 1994 में हुई। यहां बने 5 बोर्ड में से 2 बार भाजपा व 3 बार कांग्रेस काबिज रही। अब जोधपुर नगर निगम को उत्तर के 80 वार्ड और दक्षिण के 80 वार्ड में बांटा गया है। यहां 1994 से 99 के बोर्ड में डॉ. खेतल खानी और कुछ समय संगीता सोलंकी कार्यवाहक महापौर रही। 99 से 2004 में कांग्रेस के शिवलाल टांक, 2004 से 2009 में कांग्रेस की ओम कुमारी गहलोत, 2009 से 2014 के सीधे निर्वाचन में रामेश्वर दाधीच और अंतिम बोर्ड में भाजपा के घनश्याम ओझा महापौर रहे। जोधपुर की 3 विधानसभा सीटों में जोधपुर शहर और सरदारपुरा पर कांग्रेस का कब्जा है। दोनों विधानसभा का अधिकतर क्षेत्र उत्तर निगम में आता है। भाजपा के कब्जे में सूरसागर विधानसभा है, जिसका बड़ा हिस्सा दक्षिण निगम में आता है। 

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कांग्रेस ने बनाए निगम चुनाव के प्रभारी, पंचायत चुनाव व हस्ताक्षर अभियान की कवायद शुरु

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