सियासी संकट में गहलोत ही बचा पाए अपनी सरकार, कर्नाटक- मध्य प्रदेश में गिरीं गैर भाजपा शासित सरकारें 

जुलाई 2020 में सचिन पायलट कैंप की बगावत के चलते गहलोत सरकार पर आया था सियासी संकट -डेढ़ महीने बाड़ेबंदी में रही थी गहलोत सरकार -14 अगस्त 2020 को विधानसभा में हासिल किया था विश्वास मत-15 साल बाद साल 2018 में मध्यप्रदेश में बनी कांग्रेस सरकार 15 माह ही चल पाई-कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस सरकार भी सियासी संकट में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाई-अब शिवसेना विधायकों की बगावत के चलते उद्धव ठाकरे सरकार पर भी है सियासी संकट 

June 23, 2022 2:08 pm
सियासी संकट में गहलोत ही बचा पाए अपनी सरकार, कर्नाटक- मध्य प्रदेश में गिरीं गैर भाजपा शासित सरकारें 

जयपुर। महाराष्ट्र में शिवसेना सहित 40 विधायकों की बगावत के चलते उद्धव सरकार पर सियासी संकट आ गया है। बीजेपी पर कांग्रेस-एनसीपी, शिवसेना गठबंधन सरकार गिराने का षड़यंत्र रचने के आरोप लग रहे हैं। महाराष्ट्र में महाअघाड़ी सकार बीते 3 साल से चल रही है, लेकिन अब शिवसेना के ही विधायकों के बागी होने पर सरकार अल्पमत में आ गई है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब अपने ही विधायकों के बागी होने चलते सरकारों पर सियासी संकट आया हो। साल 2018 से लेकर अब तक राजस्थान सहित चार प्रदेशों में गैर भाजपा शासित सरकारें सियासी संकट झेल चुकी हैं।

गैर बीजेपी शासित राज्यों में आए सियासी संकट 

दरअसल सबसे बड़ी बात तो यह है कि साल 2018 से लेकर अब तक जिन चार राज्यों पर सियासी संकट आया है। उन सभी 4 राज्यों में गैर बीजेपी की सरकार हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में गैर भाजपा शासित सरकारें रहीं। इसलिए कांग्रेस और अन्य दल बीजेपी और केंद्र की मोदी सरकार पर गैर भाजपा शासित राज्यों में सरकार गिराने की साजिशों के आरोप लगाते रहे हैं।

सियासी संकट के बावजूद बची गहलोत सरकार 

जुलाई 2020 में कोरोना महामारी के बीच सचिन पायलट कैंप की ओर से बगावत करने के बाद गहलोत सरकार पर सियासी संकट आ गया था। सचिन पायलट अपने समर्थक 19 विधायकों के साथ मानेसर चले गए थे तो वहीं गहलोत बचे हुए विधायकों और समर्थित विधायकों के साथ बाड़ेबंदी में चले गए थे।

सरकार पूरे 35 दिन बाड़ेबंदी में रही। जयपुर के कई लग्जरी रिसोर्ट और जैसलमेर में भी विधायक बाड़ेबंदी में रहे। तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी के केंद्रीय नेताओं पर सरकार गिराने की साजिशें रचने के आरोप लगाए थे। विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप भी लगे थे। इस दौरान फोन टैपिंग जैसे मामले भी सामने आए थे। बगावत करने पर कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया था ।

साथ ही उनके साथ गए थे कैबिनेट मंत्री रमेश मीणा और विश्वेंद्र सिंह को भी बर्खास्त किया गया था। हालांकि बाद में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के चलते सचिन पायलट कैंप की नाराजगी दूर हुई और वो फिर से कांग्रेस खेमे में आए।

14 जून 2020 को किया विश्वास मत हासिल 

इधर सचिन पायलट कैंप की बगावत के चलते बीजेपी गहलोत सरकार पर अल्पमत में होने का दावा करते हुए विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने को लेकर प्रस्ताव लेकर आई थी। गहलोत सरकार ने विधानसभा में विश्वासमत हासिल कर लिया था। सरकार के पक्ष में 126 वोट पड़े थे और इस तरह से गहलोत सरकार गिरने से बच गई थी।

कर्नाटक में गिरी जेडीएस-कांग्रेस सरकार 

वहीं साल 2019 में भी कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर और कांग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही थी। तब एचडी कुमारस्वामी गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री थे। जुलाई 2019 में गठबंधन के 16 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था और दो निर्दलीय विधायकों ने भी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

इसके चलते एचडी कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ गई थी। तब भी सरकार गिराने के षड्यंत्र के आरोप बीजेपी पर लगाए गए थे। प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने कुमारास्वामी सरकार के अल्पमत में होने का दावा किया था। विधानसभा में कुमार स्वामी सरकार को विश्वास मत हासिल करना था लेकिन गठबंधन सरकार के पक्ष में 99 ही वोट पड़े जबकि विश्वास मत के विरोध में 105 वोट पड़े। इस तरह से कुमारास्वामी सरकार कर्नाटक में गिर गई थी और बीजेपी की सरकार कर्नाटक में बनी।

मध्यप्रदेश में भी 15 महीनों में गिरी कमलनाथ सरकार

 मध्यप्रदेश में शिवराज चौहान के लगातार 15 साल शासन में रहने के बाद दिसंबर 2018 में कमलनाथ के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी लेकिन यह सरकार केवल 15 महीने और 17 दिन ही चल पाई।

दरअसल तब तत्कालीन मध्यप्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया था। 9 मार्च 2020 को ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके साथ 22 कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे के बाद कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 11 मार्च 2020 को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली थी और इसके बाद 11 मार्च को ही भोपाल में कमलनाथ ने कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई, जिसमें 93 विधायक पहुंचे थे जिससे साफ हो गया था कि कमलनाथ सरकार खतरे में है।

13 मार्च 2020 को जयपुर में हुई थी मध्यप्रदेश कांग्रेस विधायकों की बाड़ेबंदी

इधर कमलनाथ सरकार पर आए सियासी संकट के बीच 13 मार्च 2020 को मध्यप्रदेश कांग्रेस के विधायकों की बाड़ेबंदी जयपुर में की गई थी। तब भी बीजेपी पर विधायकों की  हॉर्स ट्रेडिंग करने और सरकार गिराने की साजिश रचने के आरोप लगाए गए थे।

17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था सियासी संकट का मामला

 17 मार्च 2020 को सियासी संकट का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।  बीजेपी  विधान सभा स्पीकर के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।  3 दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चली और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराए जाने के निर्देश दिए और 20 मार्च 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने शाम 5 बजे का समय फ्लोर टेस्ट के लिए तय किया था। 

20 मार्च को ही कमलनाथ सरकार को फ्लोर टेस्ट से गुजरना था लेकिन उससे पहले ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री आवास पर एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। उन्होंने राजभवन पहुंचकर राज्यपाल लालजी टंडन को अपना इस्तीफा भी सौंप दिया था। इस तरह 15 महीने तक ही कमलनाथ सरकार चल पाई और गिर गई। उसके बाद 23 मार्च 2020 को शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

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