कला आमेरा को डॉक्टरेट की उपाधि

Tonk news । मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के हिंदी विभाग कि शोधार्थी कला आमेरा को डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई। आमेरा ने यह शोध कार्य राजकीय स्नाातकोत्तर महाविद्यालय सिरोही कि सह आचार्य डॉ. शची सिंह के निर्देशन में पूर्ण किया। शोध का विषय समकालीन हिंदी कवयित्रियों की कविताओं में स्त्री अभिलक्षणाएं था।

शोध में यह तथ्य उभरकर सामने आए की स्त्री समाज, देश में व दुनिया में अपनी अद्भुत विशेषताओं के कारण सृष्टि के सभी जीवधारी प्राणियों में अपना सर्वोच्च स्थान रखती है जिनमें मातृत्व के रूप में छिपा अदम्य वात्सल्य, तीज-त्यौहार व लोक संस्कृति से जुड़ा अटूट रिश्ता, कुशल नेतृत्व व उत्तरदायित्व क्षमता के साथ प्रखर दूरदृष्टि, सकारात्मक व आशावादी दृष्टिकोण से लबालब व्यक्तित्व, कूट-कूट कर भरी हुई करूणा, प्रेम व आत्म समर्पण की भावनाए सृष्टि के समस्त जीवधारियों के प्रति वसुधेव कुटुंबकम की भावना, अपने व पराये के प्रति संवेदनशील दृष्टि, अपने शारीरिक व मानसिक बदलाव के प्रति सजग, धैर्य से ओतप्रोत स्वभाव आदि है। जब स्त्री के इन अभिलक्षणों की उपेक्षा कि जाती है उन्हें स्त्री का स्वभाव बताकर अनदेखा कर दिया जाता है तो उसके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहूँचती है। हमेशा मतारोपण-दोषारोपण से स्त्री अपने वास्तविक गुणों को बिसरती जाती है साथ ही मानसिक विकारों से विचलित व सहमी-सहमी सी बॉडी डिस्मार्फिक डिस्आर्डर, जैसी बिमारियों से ग्रसित हो जाती है।

चूँकि स्त्री अभिलक्षणाएँ प्रकृति प्रदत्त है समाज प्रदत्त नहीं इसलिये एक स्त्री पर जब जबरन धर्म व संस्कारों के नाम पर दबाव बनाया जाता है तो वहाँ प्रतिरोध की भावना पैदा होती है। इसी प्रतिरोध से तनाव और तनाव से अलगाव का जन्म होता है।

समकालीन हिंदी कवयित्रियों की कविताओं द्वारा इस बात पर जोर दिया गया है कि बौद्धिक व मानसिक स्तर पर बदलाव लाकर ही स्त्री के प्रति सकारात्मक वातावरण का निर्माण किया जा सकता है।

साथ ही यहां ऐसी रचनाओं से निश्चित रूप से समाज में स्त्री की स्थिति बदलेगी, समाज का नजरिया बदलेगा, आने वाली पीढी में परिवर्तन देखा जाएगा, स्त्री-पुरुष में भिन्नता जैसे मुद्दे समाप्त होंगे और जिस स्वस्थ समाज का सपना हमारे महापुरुषों व कवयित्रियों ने देखा है वह साकार होगा क्योंकि हर स्त्री में विशिष्ट अभिलक्षण है ऐसे अभिलक्षणों के लिए विशिष्ट शिक्षा व्यवस्थाए विशिष्ट पारिवारिक वातावरण व विशिष्ट मानसिकता होनी चाहिए तभी सकारात्मक वातावरण तैयार हो पायेगा।