वास्तविक सुख की अपेक्षा में किसी भी वस्तु की अपेक्षा ना करें-योगेश्वरानंद


भीलवाड़ा-(मूलचन्द पेसवानी)। रविवार को हरी शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर भीलवाड़ा में आयोजित पुरुषोत्तम मास के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के अंतर्गत तृतीय दिवस पर श्री पुरुषोत्तम कथा के प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यासपीठ से स्वामी योगेश्वरानंद जी महाराज ने कहा कि जिन्हें वास्तविक सुख की अपेक्षा हो वे किसी भी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से किसी भी वस्तु की अपेक्षा ना करें।

दूसरे से अपेक्षा रखने वाला व्यक्ति अपेक्षा की वस्तु के अधीन हो जाता है।
इस तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए उन्होंने भगवान श्री राम के राज्याभिषेक की चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्याभिषेक की बात सुनकर भगवान श्री राम विचलित नहीं हुए। उसी प्रकार 14 वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या आने पर प्रभु श्री राम के चेहरे पर ग्लानी के कोई चिन्ह नहीं दिखे।

श्रीराम ने किसी भी वस्तु के अधीन अपने सुख को नहीं बांधा इसलिए वे परम सुखी रहे। यह उदाहरण पुरुषोत्तम कथा के वाचक रोम हर्षण नामक सूत ऋषि की चर्चा प्रसंग में प्रस्तुत किया। प्राचीन ऋषियों के द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं जैसे व्याध्र चर्म ,मृग चर्म चंवर, मयूरपंख आदि का उल्लेख करते हुए व्यासपीठ से बताया कि वर्तमान में जीव हिंसा को रोकने की दृष्टि से पूर्व ऋषियों द्वारा उपयोग ली जा रही इन वस्तुओं का उपयोग करना अनिवार्य नहीं है।


श्री पुरुषोत्तम कथा में पूर्व पार्षद जितेंद्र दरयानी ने व्यास पीठ पर माल्यार्पण किया। आश्रम प्रांगण में प्रातः काल में मंडलों की पूजा नित्य अभिषेक व हवन यज्ञ अनेक स्त्रोत्र आदि रोजाना संपन्न हो रहे हैं।


सायंकालीन सत्र में तृतीय दिवस की भागवत कथा में उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा सुनाते हुए समझाया कि ध्रुव की सौतेली मां सुरूचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया ,जिसे बहुत बड़ा संकट टल गया ।परिवार व सनातन धर्म को बचाए रखने के लिए धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता रहती है ।

और भक्त ध्रुव की द्वारा तपस्या श्री हरि को प्रसन्न करने की कथा सुनाते हुए बचपन में ही बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है मानव को अपने जीवन में काम, क्रोध ,लोभ ,मोह ,हिंसा संग्रह आदि का त्याग कर, विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए।व्यासपीठ पीठाधीश्वर ने भागवत कथा के दौरान कथा कथा प्रसंगों में वेदव्यास जी के जन्म,कर्म ,श्रीमद् भागवत कथा की रचना, द्रौपदी का चरित्र ,कुंती स्तुति, भीष्म स्तुति, परीक्षित जी की के जन्म, कर्म का उल्लेख किया है।

आज सांय काल में जीनगर समाज के प्रतिनिधि कैलाश जीनगर भगवान दास जीनगर राजेश नागर कैलाश चंद्र सांखला राहुल सांखला ने श्री भागवत महापुराण की आरती एवं पूजन अर्चन किया।