टोंक रत्न रामरतन कोली: संत प्रवृति के अलौकिक महामना, विचारधारा के लिए नौकरी से इस्तीफ़ा देकर आपातकाल में 19 महीने की जेल काटने वाला स्वयंसेवक

Tonk / सुरेश बुन्देल । विचारधारा की ख़ातिर सरकारी नौकरी को लात मारकर अपने परिवार को दांव पर लगाने की हिम्मत बहुत कम लोगों में होती है, मामला तब अत्यंत नाजुक हो जाता है, जब गुज़र-बसर का अन्य ज़रिया ना हो।

टोंक रत्न रामरतन कोली: संत प्रवृति के अलौकिक महामना, विचारधारा के लिए नौकरी से इस्तीफ़ा देकर आपातकाल में 19 महीने की जेल काटने वाला स्वयंसेवक 1

परिवार के लिए तो हर कोई जीता है किन्तु सामाजिक हित के लिए जीने वाला व्यक्ति मरकर भी अमर हो जाता है। ये दास्तान उस स्वयंसेवक की है, जिसने जुनून की तमाम हदों को पार करते हुए सरकार की नौकरी तो छोड़ी ही, आपात काल में 19 महीने की जेल भी काटी।

आज़ादी के बाद टोंक जिले के मशहूर कम्पाउण्डर रामदेव कोली के घर 1 जुलाई 1939 को पैदा हुए ‘रामरतन’ ने अपने नाम को सार्थक करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन समाज को अर्पित कर दिया। ‘भाई साहब’ के नाम से मशहूर रामरतन की पढ़ने- लिखने में काफी दिलचस्पी थी, लिहाजा उन्होंने इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा ग्रहण की और पढ़ते- पढ़ते ही वे मई 1962 को गवर्नमेन्ट कॉलेज- टोंक में लिपिक पद पर मुलाज़िम हो गए।

तबादलों की प्रताड़ना, नौकरी से इस्तीफा, आपात काल में जेल

बचपन से ही गीत-संगीत में गहरी रुचि होने के कारण उन्होंने बाक़ायदा गायन, वादन और नर्तन (कत्थक) सीखा और बहुत जल्दी महारत हासिल कर ली! वे हारमोनियम और तबला- ढोलक बजाने के उस्ताद थे। शास्त्रीय नृत्य कत्थक करने में उनका कोई सानी नहीं था, यही वजह रही कि उनके गाने- बजाने के शौक को लेकर उनके पिता हमेशा परेशान रहे क्योंकि हर बाप की हसरत होती है कि उसकी औलाद पढ़- लिखकर जल्दी नौकरी लगे।

वे तकरीबन सारे खेल खेला करते थे। उन्हें कबड्डी, फुटबॉल, वॉलीबॉल का विशेषज्ञ खिलाड़ी माना जाता था। किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने का शौक रहा। धीरे- धीरे संघ कार्य को ही जीवन का ध्येय बना लिया।

उस दौर की कांग्रेस सरकार ने संघ कार्यों में अतिशय लिप्त रहने की वजह से उनका बार- बार तबादला भी किया। उन्हें जल्दी- जल्दी स्थानांतरित कर टोंक कॉलेज के बाद 1970 में ब्यावर कॉलेज, 1971 में सांभर कॉलेज और सवाई माधोपुर कॉलेज, 1972 में रामगढ़ कॉलेज, 1973 में फिर सांभर कॉलेज और 1975 में बारां कॉलेज भेजकर प्रताड़ित करने का काम किया। इसके बावजूद उनका स्वाभिमान हार मानने को तैयार ना था, लिहाजा उन्हें सरकार के इशारे पर 1975 में नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा और संघ का स्वयंसेवक होने के नाते उन्हें 19 महीने के लिए जेल में डाल दिया गया।

असली मायनों में खामोश समाज सुधारक

जेल में उनके साथ पूर्व मुख्य सचेतक महावीर प्रसाद जी जैन भी रहे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अपना सारा जीवन समाज सुधार में झौंक दिया। उनकी पहचान टोंक में किसी तरह के परिचय की मोहताज़ नहीं रही, सब लोग उनकी संत प्रवृति, ईमानदारी, स्वाभिमान, संगीतकारी, गीतकारी, समाज सेवा और प्रतिभाओं से वाकिफ़ रहे, नज़दीकी लोग आज भी उनके मुरीद हैं। उन्होंने संघ के कई लोकप्रिय देशभक्ति गीतों की रचना की। संघ के स्वयंसेवक के तौर पर उनकी छाप बहुत अमिट और अविस्मरणीय है। यहां तक की वे अपने दस्तख़त में भी ‘S’ वर्ण का इस्तेमाल किया करते थे, जिसका मतलब ‘स्वयंसेवक’ होता है।

संघ कार्य जारी रखने के साथ- साथ ही उन्होंने ‘समाज सुधार’ का बीड़ा भी उठाया, सामाजिक बदहाली, जहालत व पिछड़ेपन को वे जड़ से दूर करना चाहते थे। उन्होंने हमेशा बाल विवाह, मृत्यु भोज, नशे, अंधविश्वास, कुरीतियों, कुप्रथाओं आदि बुराइयों के ख़िलाफ़ जबरदस्त मुहीम चलाई। उन्होंने अपने समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए ‘कोली समाज समिति’ के माध्यम से अभियान भी चलाया।

कोली नवयुवकों को संगठित कर ‘महावर नवयुवक मंडल’ की स्थापना की। ‘श्री कृष्ण सामूहिक विवाह संघ’ का गठन करके कोली समाज के दो बड़े सामूहिक विवाह सम्मलेन भी कराए, अजमेर की शंकर बीड़ी के मालिक उनकी ईमानदारी के बड़े क़ायल थे तथा उनके आग्रह पर लाखों रूपए का दान कर दिया करते थे।

शिक्षा की अलख जगाने वाली अग्रिम पंक्ति के पुरोधा

मासिक पत्रिका ‘कोली विवेक’ का सम्पादन किया! ‘बाल शिक्षा सदन’ और ‘भगवान गौतम बुद्ध विद्यापीठ’ नामक विद्यालय चलाकर शिक्षा की अलख भी जगाई। कत्थक, गायन, वादन, भजन गायिकी और संगीत के क्षेत्र में उनके शिष्यों की लंबी फेरहिस्त है, जो आज भी बड़ी तादाद में मौजूद है। बाबा साहब की तरह ही उनके विचार बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित रहे।

पैसा कमाने का उद्देश्य कभी नहीं रहा लिहाज़ा परिवार के आर्थिक हालात हमेशा खराब ही बने रहे। राजनीतिक क्षेत्र में भाजपा ने उन्हें जिलाध्यक्ष का दायित्व भी सौंपा लेकिन सियासी दांवपेंच नहीं जानने की वजह से पटरी नहीं बैठी। समाज सेवा सर्वोपरि हावी रही।

उनके बारे में संघ के राष्ट्रीय और प्रांतीय वरिष्ठ प्रचारक हस्तीमल जी, मूलचंद जी सोनी, जुगल किशोर जी, माणक चंद जी पाथेय कण, शिवलहरी जी, विजयानंद जी, जगदीश जी, धूणीलाल जी, स्व. रामकुंवार जी टिक्कीवाल, चुन्नी लाल जी टाक आदि बेहतर जानते हैं।

उनके मित्रों में रामलाल जी चौधरी, स्व. श्याम प्रकाश जी थारवान, जगदीश जी कुमावत, रमेश जी चौधरी, हितेश जी एस. डी. ओ., अशोक जी खटोड़, गंभीर जी जैन, महेश जी शर्मा, प्रह्लाद जी सोगरा, उम्मेद सिंह जी मेहता, रामपाल जी महावर, सी. एम. महावर, श्रीनारायण जी शर्मा आदि प्रमुख थे। पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष गणेश माहुर और राजस्थान सफाई कर्मचारी आयोग के पूर्व सदस्य दीपक संगत उन्हें अपना राजनीतिक गुरु भी मानते हैं। जीवन के आख़िरी पड़ाव पर भी उन्होंने लोगों की भलाई की फ़िक्र की।

वस्तुतः ऐसी भलमनसाहत मार्मिकता का चरम होती है, जहां मरने के बाद भी परोपकार की कामना की गई हो।

दुनिया को अलविदा कहने से पूर्व उन्होंने एक अंतिम इच्छा पत्र लिखा, जिसके प्रमुख अंश अत्यंत मार्मिक हैं-

1. जिस किसी भी स्थान पर मेरी मृत्यु हो, वहीँ पर मेरा अंतिम संस्कार कर दिया जाए।

2. मेरी मृत्यु की सूचना जिन रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को देनी है, उन्हें मृत्यु के समय तथा शव ले जाने के समय से अवगत कराया जाए ताकि लोगों का अनावश्यक वक़्त बर्बाद ना हो!

3. मेरी मौत के बाद घरवालों को रोने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जीने के समान ही मरने की क्रिया हुई है। मोह त्याग कर सम्यक दृष्टि अपनाएं।

4. मरने के तुरंत पश्चात नेत्रों को दान कर दिया जाए।

5. देश की समस्त नदियां पवित्र हैं, बनास नदी में ही अस्थियां विसर्जित कर दी जाएं। पानी ना होने की स्थिति में रेत में ही गाड़ दें।

6. अग्नि दाह संस्कार ही श्रेष्ठ है, किसी भी प्रकार के मृत्यु भोज का आयोजन ना करें।

7. मुझसे दुश्मनी रखने वालों को भी शव यात्रा में शामिल होने से ना रोकें।

8. सभी लोग ‘विपश्यना’ को अपनाएं, यह कोई सम्प्रदाय विशेष में दीक्षित होना नहीं बल्कि जीवन का कल्याणकारी मार्ग है।
अंततोगत्वा व्यक्तिगत अस्वस्थता उन पर भारी पड़ी, सबको जाना पड़ता है। उन्हें भी 27 अक्टूबर 1996 को नियति के क्रूर हाथों ने छीन लिया।

सुरेश बुन्देल, टोंक @कॉपीराइट