टोंक रत्न जगदीश नारायण शर्मा ‘बेनाम’: सृजनता को समर्पित प्रतिभावान व्यक्तित्व ,साहित्य कला की मौलिकता के सशक्त हस्ताक्षर

Tonk /सुरेश बुन्देल । फ़नकारी के मामले में टोंक का रूतबा काफी ऊंचा है, जहां एक से बढ़कर एक कलाकार और हुनरमन्द शख्सियतों ने जन्म लिया।

इसी सिलसिले में एक गुदड़ी का लाल भी पैदा हुआ, जिसने अपनी जिन्दगी के हर लम्हे को सार्थकता प्रदान की। शुचिता, संवेदनशीलता और मौलिकता जिसमें आज भी कूट-कूटकर भरी हुई है। जीवन के वानप्रस्थ पड़ाव पर भी राष्ट्र चिन्तन का जज़्बा जिसके मन में हिलोरें मारता दिखाई देता है। ऐसी विभूति जगदीश नारायण शर्मा ‘बेनाम’ के नाम से जानी जाती है।

बीसलपुर (टोंक) में रहने वाले प्रभुलाल नामक दरिद्र ब्राह्मण के यहां 14 जुलाई 1951 को पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम जगदीश रखा गया। शर्मा दम्पति में सोचा भी ना होगा कि उनका बेटा अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से परिवार और टोंक जिले का नाम रोशन करेगा।

बचपन से ही प्रतिभावान विद्यार्थी रहे जगदीश ने अपनी शिक्षा सवाई माधोपुर, देवली, टोंक व कोटा स्थित स्कूल-कॉलेजों से पूर्ण की। वाणिज्य विषय में दिलचस्पी होने के कारण उन्होंने बी.कॉम., एम.कॉम. और व्यवसाय प्रबन्धन की डिग्रियां हासिल कीं। मुलाज़िम के तौर पर जगदीश शर्मा दी राजस्थान स्टेट टेनेरीज लिमिटेड-टोंक, तिलम संघ-जयपुर और जोधपुर विधुत वितरण निगम में रहे।

सामाजिक सरोकारों में रूचि और श्रमिक हितों

के लिए संघर्ष करने की गरज़ से जगदीश भारतीय मजदूर संघ से जुड़े, उनकी सक्रियता व काबिलियत देखकर उन्हें जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया। स्वाभाविक सृजनशीलता जगदीश के व्यक्तिव का अहम हिस्सा रही। वे साहित्यिक गतिविधियों के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी के कलाकारों को मंच प्रदान करने में सतत प्रयत्नशील रहे। उन्होंने साहित्य को समर्पित ‘काव्य कुन्ज’ नामक संस्था की स्थापना की।

टोंक रत्न जगदीश नारायण शर्मा 'बेनाम': सृजनता को समर्पित प्रतिभावान व्यक्तित्व ,साहित्य कला की मौलिकता के सशक्त हस्ताक्षर 1

इस साहित्य समूह में टोंक के कई साहित्यकार, साहित्य प्रेमी और प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे। जगदीश काष्ठ हस्तशिल्प कला और चित्रकला के माहिर कलाकार भी हैं, जो व्यर्थ/अनुपयोगी लकड़ियों को नायाब शक्ल देकर दुर्लभ बना देते हैं। उनकी चित्रकारी के नमूने देखने लायक हैं।

जगदीश नारायण को अपनी पत्नी चन्द्रकला शर्मा (राजकीय विधालय से सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका) का भरपूर सहयोग मिला, जिले में उनको भी सुधी साहित्य प्रेमी माना जाता है। परिवार में उनकी पुत्री अर्पणा शर्मा (राजकीय व्याख्याता भूगोल) एक पुत्र शैलन्द्र शर्मा (ग्राम पंचायत सहायक) और दूसरे पुत्र अंकेश शर्मा (निजी व्यावसाय) अपने पिता के पदचिन्हों का नियमित रूप से अनुसरण करते हैं।

साहित्य सृजन के मामले में बेनाम ने* रूसी कहानियों का दिलचस्प अंदाज में अनुवाद किया। जिसकी एवज में उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव के सचिव की दाद मिली। रशियन कहानियों ‘कौन जगाता है नदी को’, ‘किसकी अधिक जरूरत’, ‘सब कुछ इतना सुंदर क्यों’ आदि पर केन्द्रित उनका सृजन काफी प्रसिद्ध हुआ।

1986- 87 में बेनाम की रचनाओं को भारतीय राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री कार्यालय से भी सराहा गया। बेनाम की लेखनी एकता, प्रेम, भाईचारे, देशभक्ति, ज्वलंत विषयों आदि पर खूब चली। काव्य की प्रत्येक विधा में दक्षता रखने वाले बेनाम कभी पेशेवर नहीं रहे। उन्होंने लफ़्ज़ों की तिज़ारत कभी नहीं की। देश भर की पत्र- पत्रिकाओं में उनकी 2000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है।

साहित्य साधक के तौर पर उनकी लेखनी की मौलिकता से साहित्य प्रेमी परिचित हैं। उनकी रचनाओं पर दृष्टिपात

करने की ज़रुरत है:-

खिल-खिल कर जो हंसे, वही फूल मुरझाए हैं

जो डाली से बिछुड़ गए, याद बहुत आए हैं
“हिंदी बिन हिंदुस्तान में, कागज की काया कोरी है!
है माला के मणिए भाषाएं, हिंदी माला की डोरी है!!”
हर नेता के पीछे एक बंदूकधारी है
ये कैसा परिवर्तन, कैसी लाचारी है

सुरेश बुन्देल, टोंक- राजस्थान