टोंक रत्न बनवारी लाल बैरवा: जिले के सर्वाधिक कामयाब राजनेता, प्रदेश में दो बार मंत्री और उप मुख्यमन्त्री भी रहे थे सरल हृदय बाऊजी

Tonk / सुरेश बुन्देल। जनता में बाऊजी के नाम से मशहूर रहे बनवारी लाल बैरवा की दास्तान बेहद दिलचस्प रही है, उन्हें आज भी लोग गाहे-ब-गाहे याद कर ही लेते हैं। राजनीति हमारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। उससे जुड़ी जिले की खास सियासी शख्सियतों का जिक्र करना भी बहुत जरूरी है, भले ही वे किसी भी विचारधारा या पार्टी से जुड़े रहे हों। जिले के सबसे कामयाब जन प्रतिनिधि के तौर पर बनवारी जी को आज भी याद किया जाता है, जिनकी वफादारी की वजह से कांग्रेस पार्टी में उनकी प्रतिष्ठा हमेशा बरकरार रही। सबसे खास बात तो ये रही कि वकालत से शुरू हुआ उनका सार्वजनिक जीवन राजस्थान के उप मुख्यमंत्री पद पर जाकर खत्म हुआ।

धन्ना तलाई से चलकर विधानसभा और संसद पहुंचने का सफ़र

बनवारी लाल का जन्म टोंक के धन्ना तलाई इलाके में रहने वाले किसान दौलत राम के घर 19 जनवरी 1933 को हुआ था। पढ़ाई में दिलचस्पी होने की वजह से उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम. ए./ एल. एल. बी. तक की तालीम हासिल की और 1961 से 1964 तक धौलपुर नगर पालिका में अधिशाषी अधिकारी पर तैनात हुए। नौकरी उन्हें रास नहीं आई, लिहाजा उन्होंने वकालत करने का निश्चय किया और पहला चुनाव जीतकर 1966 में टोंक नगर परिषद में उप सभापति बने। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। निवाई विधानसभा का चुनाव जीतकर पहली बार राजस्थान सरकार में जेल एवं मुद्रण राज्य मंत्री (1972- 1977) बनाए गए। 1980 तथा 1984 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल कर बाऊजी लगातार दो बार सांसद बने। 1993 में उन्होंने निवाई विधानसभा का चुनाव फिर जीता, तब राज्य में भैरोंसिह शेखावत की भाजपा सरकार बनी थी। 1998 में बनी अशोक गहलोत सरकार में बनवारी लाल को दूसरी बार समाज कल्याण, आयोजना व यातायात मंत्री बनाया गया। इसके बाद 2002 में उन्हें उप मुख्यमंत्री का दायित्व सौंपा, जो उनके राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। 22 जुलाई 2009 को उनका परलोक गमन हुआ।

सादगी, सरलता और सहजता की प्रतिमूर्ति थे बाऊजी

सक्रिय राजनीति में होने के बावजूद बाऊजी की दिलचस्पी समाजसेवा, मेहतर बंधुओं के उत्थान और पिछड़े- दलित कल्याण में ज्यादा रही। अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए भी वे प्रयत्नशील रहे। ग्रामीण क्षेत्र के कमजोर तबकों की सेवा के लिए वे सदैव तत्पर रहा करते थे। उर्दू व हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र और राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में उनकी खासी दिलचस्पी थी। आज भी कृषि मंडी के पास बने उनके आवास ‘कमला भवन’ में बाऊजी का पुस्तकालय और उनकी स्मृतियां मौजूद हैं। नए बस स्टैंड के समीप लगी हुई बाऊजी की प्रतिमा देखकर लोग उनकी यादें ताजा कर लेते हैं। जो उन्हें करीब से जानता है, वो उनकी पुण्य तिथि पर जरूर श्रद्धा सुमन अर्पित करने आता है। उनका सरल, सहज, विनम्र और मधुर स्वभाव ही उनके व्यक्तित्व की विशेषता रही, जिसकी बदौलत वे शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचे और टोंक जिले की सियासत में सबसे ज़्यादा कामयाब हुए।

सुरेश बुन्देल- टोंक @कॉपीराइट