स्थानीय निकाय विभाग की जांच में देवली पालिका की भूखण्ड आवंटन प्रक्रिया नियम विरुद्ध

नगर पालिका कर्मचारियों को भूखण्ड आवंटन प्रक्रिया की जांच शहर युवक कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष राजेन्द्र ग्वाला की शिकायत पर की गई। इस पर रविन्द्र कुमार शर्मा, उपनिदेशक स्थानीय निकाय विभाग अजमेर को जांच समिति का अध्यक्ष बनाया। जबकि जांच दल में हजारीराम सिरवी, उपविधि, परामर्शी नगर निगम अजमेर व रोहित पाराशर लेखा अधिकारी नगर परिषद किशनगढ़ को सदस्य बनाया है

जांच रिपोर्ट में हुआ खुलासा
लियाक़त अली 
टोंक
नगर पालिका मण्डल देवली की ओर से फरवरी माह में कर्मचारियों को किए गए प्लॉटों के आवंटन के मामले में कार्यालय उपनिदेशक(क्षेत्रीय)स्वायत्त शासन विभाग के जांच दल ने आवंटन प्रकिया को नियम विरुद्ध माना है। जिसकी रिपोर्ट विभागीय दल ने उच्चाधिकारियों को भेज दी है।
    नगर पालिका कर्मचारियों को भूखण्ड आवंटन प्रक्रिया की जांच शहर युवक कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष राजेन्द्र ग्वाला की शिकायत पर की गई। इस पर रविन्द्र कुमार शर्मा, उपनिदेशक स्थानीय निकाय विभाग अजमेर को जांच समिति का अध्यक्ष बनाया। जबकि जांच दल में हजारीराम सिरवी, उपविधि, परामर्शी नगर निगम अजमेर व रोहित पाराशर लेखा अधिकारी नगर परिषद किशनगढ़ को सदस्य बनाया है। गठित समिति ने जुलाई की 5 तारीख को बैठक हुई। बाद में शिकायत के तथ्यों के सत्यापन के लिए उपनिदेशक रविन्द्र कुमार ने स्वयं ही मौका निरीक्षण किया। इस पर जांच दल ने नगर पालिका देवली के रिकार्ड व भूमि निष्पादन नियम 1974 के प्रावधानों का विस्तृत अवलोकन किया। इस पर गठित जांच दल ने पांच बिन्दूओं पर वस्तु स्थिति व निष्कर्ष दिया।
पांच बिंदुओं पर की गई जांच
 इसके तहत जांच दल ने निष्कर्ष दिया कि पालिका के दस्तावेजों व पत्रावलियों के अवलोकन के बाद यह सामने आया कि भूमि निष्पादन नियम 1974 के परिशिष्ट बी के नियम 17 बिंदू संख्या 1 के अनुसार लॉटरी के लिए समिति का गठन बोर्ड द्वारा किए जाने का प्रावधान है।
लेकिन विचाराधीन प्रकरण में समिति का गठन बोर्ड की ओर से नहीं किया गया। जिसकी पुष्टि अधिशाषी अधिकारी देवली के पत्रांक 2702 से हुई। साथ ही उक्त कमेटी में जिला कलक्टर के प्रतिनिधि को भी शामिल नहीं किया गया।
भूमि आवंटन के लिए लॉटरी प्रक्रिया सन्देहास्पद
दूसरे बिंदू में जांच दल ने लॉटरी प्रक्रिया को संदेहास्पद बताया। जांच दल ने रिपोर्ट में बताया कि नियमानुसार आवंटन से शेष रहे भूखण्डों की पर्चिया रिकार्ड में रखना अपेक्षित है। लेकिन पालिका द्वारा उक्त पर्चिया उपलब्ध नहीं कराई गई। ऐसे में भूखण्ड संख्या 42 व 43 का अवंटन लॉटरी द्वारा किया जाना प्रथम दृष्टया संदेहस्पद है।
इसी की भांति तीसरे बिन्दू में नियमानुसार हस्तातंरण शुल्क भूखण्ड के विक्रय के समय उक्त नियम के अनुसार जमा होना था। लेकिन आवंटन के उपरांत भी विक्रय का प्रश्न है, नियमानुसार भूखण्ड के विक्रय पर नियमों में प्रतिबंध नही है।
वहीं चौथे बिंदू में जांच दल ने माना कि रिकार्ड देखने के बाद भूखण्ड संख्या 43 व 42 आवंटन दिनांक 26 फरवरी को किया गया तथा मांग पत्र में ही राशि के साथ एक मुश्त लीज राशि 97920 रुपए की मांग की गई। जो कि अनियमित नहीं है। जहां तक लीज राशि का प्रश्न है, भूखण्ड आवंटन की तिथि से प्रत्येक वित्तिय वर्ष में लीज राशि आवंटी को जमा करानी होती है। इसके लिए अलग से मांग पत्र जारी करने का नियम नहीं है।
भूखण्ड आंवटन को नियम विरुद्ध माना
पांचवे व अंतिम निष्कर्ष बिन्दू में जांच दल ने बड़े आकार के भूखण्ड आंवटन को अनियमित माना है। दल ने निष्कर्ष रिपोर्ट में बताया कि मानचित्र में 25 गुणा 49 फीट आकार के भूखण्ड रिक्त थे। लेकिन उक्त साइज के भूखण्ड होने के बावजूद कर्मचारियों को बड़े आकार का भूखण्ड आवंटन करना अनियमित संदिग्ध है।
साथ ही जांच दल ने माना कि पालिका ने निर्धारित स्वयं की नीति के विरुद्ध जाकर सेवानिवृत कर्मचारियों को भूखण्ड आवंटन किया है। वहीं जांच दल ने त्रुटिवश 30 गुणा 60 फीट के नाम का भूखण्ड आवंटित होना बताया है। जो कि स्पष्टत: पालिका स्वामित्व की 4 गुणा 30 फीट कम भूमि कम आवंटित कर आर्थिक क्षति करने की पुष्टि है।

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