कुम्हड़े की बलि से प्रसन्न होती जंगली देवी, भक्तों की पूरी होतीं मनचाही मुरादें

कानपुर, (हि.स.)। दुष्टों का संघार एवं भक्तों की रक्षा करने और विश्व में कल्याण कारी व्यवस्था की स्थापना के लिए आदिशक्ति जगदंबा मां अवतरित होती रहती हैं। ऐसी ही आदिशक्ति शहर के दक्षिणी भाग किदवई नगर में है, जिसका नाम जंगली देवी है। बताया जाता है कि उस समय यहां पर जंगल ही जंगल था …

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October 20, 2020 5:30 pm

कानपुर, (हि.स.)। दुष्टों का संघार एवं भक्तों की रक्षा करने और विश्व में कल्याण कारी व्यवस्था की स्थापना के लिए आदिशक्ति जगदंबा मां अवतरित होती रहती हैं। ऐसी ही आदिशक्ति शहर के दक्षिणी भाग किदवई नगर में है, जिसका नाम जंगली देवी है। बताया जाता है कि उस समय यहां पर जंगल ही जंगल था और इसीलिए इसका नाम जंगली देवी रख दिया है। यहां पर कुम्हड़े की बलि भक्त आदिशक्ति को चढ़ाते हैं और उनकी मनचाही मुराद पूरी होती है। 


आदिशक्ति मां जंगली देवी की वनदेवी रूप में उत्पत्ति अत्यंत रहस्यमयी है अनेक वृद्धजनों का कहना है कि हम लोगों के पूर्वज कहा करते थे कि इस क्षेत्र में बहुत घना जंगल था तथा इसी देवी मंदिर के पास ही एक अत्यंत रमणीय सरोवर था जो शांत पवित्र स्वच्छ एवं सुंदर वातावरण के कारण उस स्थान को तपोवन जैसा बना देता था भारतीय ऋषियों व मनीषियों ने अपनी साधना हेतु शांति व प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर पवित्र स्थल चुनने की परंपरा बनाई जिससे उनका चिंतन निर्बाध गति से चल सके संभवत इसी धारणा से इसी तपोवन में अनेक तपस्वी महात्मा तपस्या किया करते थे इस पावन स्थल की जमीन कंकरीली अथवा उबड़ खाबड़ नहीं थी तथा उक्त सरोवर के घाट सब ओर से बराबर थे। किदवई नगर का यह भाग जहां जंगली देवी का भव्य मंदिर है, कालांतर में यह भूभाग कालिंजर मंडल राज्य की अंतिम सीमा भी इसी भू-भाग के आस-पास रही होगी। 

राजा भोज ने करवाया था मन्दिर का निर्माण


इस मंदिर में लगी ताम्रप्लेट का कानपुर के दक्षिणी क्षेत्र में प्राप्त होना यह तो प्रमाणित करता है कि राजाज्ञा के रूप में यह ताम्रप्लेट मंदिर के किसी ब्राह्मण पुजारी के पास रही होगी जो वर्तमान बाकरगंज के समीप ही स्थित किसी ग्राम अथवा बस्ती में रहा होगा। कालांतर में वह ग्राम या बस्ती किसी कारण ध्वस्त हुई होगी और मंदिर के पुजारी के पास संग्रहित यह राजाज्ञा भूमि में कहीं दब गई होगी। वहीं ताम्रप्लेट में राजा भोज देव का नाम अंकित है जो लगभग 12 सौ वर्ष पूर्व राज्य करते थे। पुरातत्व विभाग की अवधारणा है कि राजा भोजदेव के पूर्वज देवी के भक्त थे और कभी ना कभी उनमें से कोई पूर्वज तब उधर से निकले होंगे तो इस वनश्री को देखकर मुग्ध हुए होंगे और यहां पर उन्होंने वनश्री देवी का मंदिर बनवा कर अपने को इसकी समुचित व्यवस्था का भार सौंप दिया होगा।वनश्री मंदिर (दुर्गा देवी) महोदय अर्थात) कन्नौज या कान्यकुब्ज शासन खंड की व्यवस्था में था और राजाज्ञा के अनुसार महोदय कार्यालय ने ताम्रप्लेट खुदवा कर प्रमाण के लिए पूजा व्यवस्था के लिए नियुक्त ब्राह्मण पुजारी को दे दी होगी। जो कि लगभग 12 सौ वर्ष पश्चात इसी क्षेत्र में खुदाई में प्राप्त हुई।

 तंत्र मंत्र और टोटके नहीं रहता प्रभाव


प्रबंधक विजय पान्डेय के अनुसार इस दरबार मे आने वाले भक्त पर कोई भी तंत्र मंत्र टोना टोटके का प्रभाव नहीं रहता माता का सिद्धि दात्री है इन्हें कुम्‍हडे की बलि के साथ पान सुपारी ध्वजा नारियल संग चुनरी चढ़ाने से उनकी प्रसन्नता प्राप्त होती है । साथ ही शुक्र व शनि व रविवार सप्तमी अष्टमी व नवमी को माता के क्रमवार दर्शनों से समस्त अभीष्ट फलों की प्राप्ति हो जाती है ,जिन कन्याओं का विवाह न हों रहा वे नवरात्र में षष्टम दिवस आकर इनकी आराधना करें और यहां मिलने वाले मां के आशीर्वाद रूपी श्रृंगार सामग्री के आशीर्वाद से शीघ्र उनकी मुराद व सुयोग्य वर किं प्राप्ति हो जाती है। संकट मुक्ति निवारण के लिए मां के पास स्थापित त्रिशूल में 3 नींबू का कीलन करने से सभी बाधाओं का तत्कािल शमन हों जाता है बसंत पंचमी को मन्दिर का वार्षिकोत्सव होता है। जिसमे देश भर से आने वाले मैया के भक्त मैया की झलक पाने को वर्ष भर बेताब रहते है।

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