महिलाओं के ख़िलाफ अपराध और इसका इस्लामी समाधान

नई दिल्ली में 23 वर्षीय निर्भया का सामुहिक बलात्कार (2012),मुम्बई में 22 वर्षीय फोटो पत्रकार का शक्ति मिल्स सामुहिक बलात्कार(2013), स्कूल में 6 साल की बच्ची का यौन शोषण बैंगलोर (2014) या उन्नाव दुष्कर्म का मामला हो या हैदराबाद की घटना हर एक घटना मानवता को शर्मसार कर देने वाली है ।

ऐसी घटनाओं पर कभी -कभार शोर भी होता है लोग विरोध भी प्रकट करते हैं, मीडिया भी सक्रीय हो जाती है इसके बावजूद अपराध कम नहीं बल्कि बढ़ते ही जा रहे हैं । हमें रोज़ाना हर इलाक़े के समाचार पत्रों में महिलाओं के ख़िलाफ अपराधों की ख़बरें छपती रहती हैं । समाचार पत्रों तक भी वही खबर प्रकाशित होती हैं, किसी तरह मामला सामने आ जाता है या रिपोर्ट दर्ज हो जाती है । जबकी बहुत से मामले तो सामने ही नहीं आते हैं इसमें वजह परिवार की इज़्ज़त, समाज, या जटिल क़ानूनी प्रक्रिया की वजह से दर्ज ही नहीं होते हैं। और जो दर्ज हो भी जाते हैं उनमें सबूतों की वजह से न्याय बहुत कम मिल पाता है ।

देश के हर कोने में महिलाओं के साथ दुष्कर्म, यौन प्रताड़ना और मानसिक प्रताड़ना स्त्रियों की ख़रीद फरोख़्त के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं ।

26 जून 2018 को जारी थॉमसन रॉयटर्स फाउण्डेशन की रिपोर्ट के अनुसार निर्भया कांड के बाद देश भर में फैले आक्रोश के बीच सरकार ने इस समस्या से निपटने का संकल्प लिया था । लेकिन भारत में महिलाओं के ख़िलाफ हिंसा में कोई कमी नहीं आई और अब वह इस मामले में विश्व के पहले पायदान पर पहुंच गया है । जबकी 2011 में भारत चौथे पायदान पर था । इस विकराल समस्या जिसमें ना चौथा पायदान बेहतर था, पहला पायदान तो शर्मनाक है किन्तु इस समस्या मैं जितने समाधान खोजते हैैं या उपाय करतें हैं परिणाम और विकराल रूप लेता जा रहा है । जो की गंभीर चिंता का विषय है ।

2011 में भारत के इस ख़राब प्रदर्शन के लिये मुख्यतः कन्या भ्रूण हत्या, नवजात बच्चीयों की हत्या और मानव तस्करी ज़िम्मेदार थी, जबकी 2018 का सर्वे बताता है कि भारत यौन हिंसा, सांस्कृतिक-धार्मिक कारण और मानव तस्करी इन तीन वजहों के चलते महिलाओं के लिये सबसे ख़तरनाक देश है  ।

राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण के अनुसार 15 से 49 वर्ष की आयु की 6 प्रतिशत महिलाओं को उनके जीवन काल में कम से कम एक बार यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है । ’’अति दुर्भाग्यपूर्ण’’

दुष्कर्म

राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ अपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है इन अपराधों में बलात्कार, घरेलू हिंसा, मारपीट, दहेज प्रताड़ना, एसिड हमला, अपहरण, मानव तस्करी, साइबर अपराध और कार्य स्थल पर उत्पीड़न शामिल हैं । राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है की वर्ष 2017 में भारत में कुल 32,559 बलात्कार के मामले आये जिनमें 93.1 प्रतिषत आरोपी क़रीबी ही थे । दुष्कर्म पीड़िता द्वारा अनुभव किया गया शारीरिक और मानसिक आघात की कल्पना नहीं की जा सकती । कई क़ानून बनने के बावजूद भी देश में दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं ।

कन्या भ्रूण हत्या़

कन्या भ्रूण हत्या महिलाओं के ख़िलाफ अपराध की श्रेणी में एक अभिशाप है । दिल्ली में रहने वाली एक महिला जो दो लड़कियों की मां बनने के बाद जब तीसरी बार गर्भवति हुई तो उसने भ्रूण परिक्षण करवाया, ये पता लगने पर की उसके गर्भ में एक लड़की है उसने गर्भपात करवा लिया, भ्रूण हत्या की यह प्रक्रिया उसने इस उम्मीद के साथ आठ बार दोहराई वो एक बेटे की मां बन सके ।

यह तो एक मिसाल है, किन्तु ना जाने कितने भ्रूण परिक्षण कठोर क़ानून होने के बावजूद किये जाते हैं सिर्फ इसलिये गर्भपात किया जाता है कि गर्भ में पलने वाली एक बच्ची है । कारण इसके पीछे कई हो सकते हैं । किन्तु कन्या की ही हत्या होती है जिसके परिणाम स्वरूप एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में पिछले दस वर्षों में क़रीब डेढ़ करोड़ लड़कियों को जन्म से पहले ही मार डाला गया या फिर पैदाइश के बाद 6 वर्षों के अन्दर ही उनको मौत के मुंह में धकेल दिया गया । इस अपराध में मां, पिता या परिवार के अलावा नई तकनीक का इस्तेमाल करके डॉक्टर भी कन्या भ्रूण हत्या के भागीदार बनते हैं ।

घरेलू हिंसा

महिलाओं के विरूद्ध घरेलू हिंसा किसी भी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे मारपीट करना, किसी वस्तु से मारना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक व सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना, उसके चरित्र को दोषारोपण करना  आदि । यूनाईटेड नेशंस पॉपूलेशन फंड रिपोर्ट के अनुसार लगभग दो तिहाई विवाहित भारतीय महिलाएं  घरेलू हिंसा की शिकार हैं और भारत में 15 से 49 आयुवर्ग की 70 प्रतिशत विवाहित महिलाएं पिटाई, बलात्कार या जबरन यौन शोषण का शिकार हैं । कोरोना महामारी के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में और अधिक वृद्धि हुई है । घरेलू हिंसा में एक महिला के साथ में किसी भी प्रकार की हिंसा होती है तो एक महिला ही प्रभावित नहीं होती उसके साथ उसके बच्चे, दो परिवारों के सदस्य अर्थात समाज प्रभावित होता है ।

दहेज हत्या

भारतीय समाज के लिये दहेज एक अभिशाप है । दहेज ने स्त्रियों का जीवन दूभर कर दिया है दहेज प्रथा के खि़लाफ संपूर्ण भारतवर्ष में समय समय पर आन्दोलन होते रहे हैं दहेज की मांग, दहेज सम्बन्धित कई अपराधों को जन्म देती है ।

भारत के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो ने 2017 तक दहेज से जुड़ी लगभग 7000 मौंतों को दर्ज किया । राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2020 में दहेज से जुड़े मामलों में हर दिन 19 महिलाओं की जान गई ।

एसिड अटैक

महिलाओं के विरूद्ध अपराध का एक चेहरा एसिड अटैक है, किसी को मौत के घाट उतार देने से उसकी पूरी ज़िन्दगी ख़त्म की जा सकती है, उसका हाथ पांव काट देने से उसे अपंग किया जा सकता है लेकिन किसी पर तेज़ाब डाल दिया जाए तो वह इंसान ना मर पाता है ना ही जी पाता है, तेज़ाब से बदसूरत हुई ज़िन्दगी को हमारा समाज सर उठाकर जीने की इजाज़त नहीं देता । तेज़ाब से सिर्फ चेहरा नहीं इंसान की आत्मा भी जलने लगती है । तेज़ाब से बर्बाद हुई ज़िन्दगीयों की कहानी भी बहुत लंबी हैं । और ये कहानियां भारतीय समाज में उन महिलाओं के दर्दनाक कहानी बयां करती हैं । महिलाओं के लिये अपने वजूद को भी बचाना नामुमकिन हो जाता है । सोनाली मुखर्जी की ज़िन्दगी की दर्दनाक एक कहानी ही ले ली जाये 22 अप्रैल 2003 को घर में घुस कर कुछ युवकों ने उसके ऊपर एसिड डाल दिया था । इसकी वजह से उसकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई और दाहिने कान से सुनाई भी देना बंद हो गया । इन युवकों ने एक दिन पहले उसके साथ छेड़छाड़ की थी जिसके जवाब में उसने इन लड़कों को कुछ इस अंदाज़ में डांटा था ’’प्लीज़ मेरा दुपट्टा दे दीजिये, मुझे घर जाना है, प्लीज़ मेरे साथ ऐसा मत कीजिए, मैं तुम सबकी शिकायत तुम्हारे घर वालों और अपने परिवार से करूंगी….. इतना कहना उन ज़ालिमों को नागवार गुज़रा और देखते ही देखते एक रात एसिड फेंककर उस युवती का चेहरा बिगाड़ दिया । सोनाली का घाव और समाज और सरकार की बेरूख़ी ने उसे इस क़दर तड़पा दिया कि उसने अपने लिय मौत मांगना ही सही समझा ।“

यह एक मामला है ऐसी कितनी सोनाली पूरे देश में तड़प रही हैं । जिन्हें एसिड अटैक का षिकार होना पड़ा है ।

…………….बलात्कार, घरेलू हिंसा, मारपीट, दहेज प्रताड़ना, एसिड हमला, अपहरण, मानव तस्करी, साइबर अपराध जितने भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का मूल कारण क्या है इसकी खोज करते हैं तो मुख्यतः सबसे सामान्य कारणों में कड़े क़ानूनों की कमी, क़ानून परिर्वतन प्रक्रिया में व्यापक कमी और न्याय का धीमा फैलाव शामिल है । आज भी जब की महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों से आगे बढ़ी हुई हैं महिलाएं अपमानित हो रही है, महिलाओं की गरिमा के लिये असम्मान की भावना की वजह माता पिता की लापरवाही और लगातार बढ़ती शराब की खपत भी है । लेकिन इन स्पष्ट कारणों के अतिरिक्त भी कुछ मूल कारणों को विस्तार से समझने के लिये कुछ बिन्दुओं को समझना ज़रूरी हो जाता है :-

  1. बोझ से दबी महिला लैंगिक समानता, महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता और पुरूषों के साथ उनके स्वतंत्र और खुले मेल मिलाप पर आधारित वर्तमान संस्कृती के सिद्धांत के परिणाम में एक तरफ महत्वाकांक्षी (बड़ा बनने की इच्छा रखने वाली) और सफल पेशेवर के रूप में और दूसरी तरफ एक स्नेही मां और स्नेही पत्नि के रूप में तीन गुना करने के लिये महिला पर अत्यधिक मांग के कारण वैवाहिक संबध तनावपूर्ण हैं । और तनावपूर्ण संबध अक्सर घरेलू हिंसा में बदलते हैं ।
  2. महिला शील या पुरूष संयम जब एक महिला वित्तीय स्वंतत्रता प्राप्त करती है, तो इसका मतलब है कि वह अपने विवाहित जीवन की तनावपूर्ण स्थिती से बाहर निकलने के लिये ख़तरा महसूस नहीं करती है, फिर वह ना विवाह करना चाहती है और ना ही बच्चे पैदा करना चाहती है, विकृत मानसिकता वाले पुरूष उसे अपनी वासना के लिए उसका शारीरिक शोषण और भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किये जाने पर और उसे एक अकेली महिला के रूप में जीवन जीने के लिए मजबूर करता है और वह जानता है कि उसका विरोध करने के लिये अकेली महिला अयोग्य हैं ।
  3. भारतीय महिलाओं पर ड्रेसिंग के प्रति व्यापक पश्चिमी उदारवादी रवैये के अनुरूप होने का दबाव है, लेकिन जिस पर अभी भी विचार किया जाता है, वह एक विस्फोटक स्थिति पैदा कर रहा है जिसमें महिलाएं मामूली रूप से कपड़े पहनने से इंकार कर देती हैं, यह आरोप लगाते हुए कि सभ्य व्यवहार की ज़िम्मेदारी पूरी तरह पुरूषों पर है, मतलब महिलाएं अपने अधिकार में किसी भी प्रकार के कपड़े पहने पर अपने कर्तव्य को भूली रहे । और पुरूष एक सभ्य समाज के प्राणी बने रहें सभ्यता को बनाये रखने की पूर्ण ज़िम्मेदारी पुरूषों पर रहे ।
  4. लड़की एक वित्तीय बोझ यह विचार भी बेलगाम भौतिकवाद और आज का हमारा आदर्श समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी लड़की को वित्तीय बोझ समझता है, गर्भपात के सबसे नये तरिक़े से अपनी ही बेटीयों को हटाने के लिये उन्हें कोई मलाल नहीं होता । और कुंठित मानसिकता की बिना पर ही दहेज मांगने की घिनौनी परंपरा और दुल्हन को जलाने के अपराध को जन्म दिया है ।
  5. महिलाओं को वस्तु बनाना धार्मिक और नैतिक मूल्यों को ठंडे बस्ते में डालकर पूरा मनोरंजन उद्योग और मास मीडिया अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिये महिला के शरीर को बेषर्मी के साथ शोषण कर रहा है, हम फिल्मों, विज्ञापनों और पोस्टरों में अष्लीलता और अभद्रता देख रहे हैं जो महिलाओं को वस्तुओं के रूप में मानते हैं जो की पुरूष संतुष्टि के अलावा कुछ और नहीं है ।

 

इस्लाम का विश्व नज़रिया

 

इस्लाम के अनुसार यह संसार अचानक वजूद में नहीं आया है और ना ही यह संसार किसी रासायनिक क्रियाओं का नतिजा है । बल्कि यह संसार एक सर्वशक्तिमान हस्ती है जिसने इस संसार को और संसार में बसने वाले हर एक प्राणी को पैदा किया है, उसकी आवष्यकताओं की पूर्ति के लिये साधन भी बनाये, उसे बेमक़सद नहीं बनाया बल्कि हर एक के जीवन को एक उद्देश्य के साथ इस धरती पर भेजा है । मनुष्य को भी इस संसार में भेजा गया है और उसके मार्गदर्शन के लिये उस पालनहार ने समय समय पर अपने दूत (पैग़म्बर) भेजे और उन्हें इस बात से अवगत कराया की अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब लिया जायेगा, जो इस दुनिया में आया है उसे वापस उसी की और पलटना है और अपने कर्मां के अनुसार उन्हें स्वर्ग और नर्क में भेजा जायेगा ।

इसीलिये सर्वशक्तिमान, पालनहार ने जो रास्ता अपने दूतों के माध्यम से बताया है उसका पालन करो ताकि ना धरती भी स्वर्ग रहे और मरने के बाद भी मनुष्य अपने पालनहार की रहमत से स्वर्ग में प्रवेश करे ।

इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था :-

इस्लाम मानव जाति द्वारा पालन की जाने वाली जीवन शैली है क्यूंकी इसे परमात्मा ने स्वयं तय किया है जिसमें सभी प्राकृतिक व मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है । इस्लाम एक सामाजिक व्यवस्था प्रदान करता है जो नैतिक मूल्यों पर आधारित है, इसमें क़ानूनी व्यवस्था भी है तो व्यक्ति के अधिकार के साथ उसके कर्तव्य भी हैं । लिंग में यदि अन्तर है तो उसका आधार परिवार व सामाजिक व्यवस्था के आवष्यकतानुसार उसकी भूमिका व कार्यों को बनाने के लिये है । इस प्रकार पुरूष को आर्थिक रूप से समर्थन देने की ज़िम्मेदारी दी जाती है जबकी महिलाओं पर ’’गृहिणी’’ होने और घर व बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी दी गई है, जिसे महिलाओं की प्रतिभा व समय की बर्बादी नहीं कहा जा सकता ।

एक महिला अपने घर व बच्चों की देखभाल करती है और पुरूष आर्थिक भार उठाने के लिये दौड़ भाग करता है। ज़िम्मेदारी का यह विभाजन किसी भी तरह महिला या पुरूष की स्थिती कमज़ोर नहीं करता जो इस्लाम उन्हें देता है, ईष्वर की दृष्टि में एक महिला पूरी तरह पुरूष के बराबर है, जो उसे अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारीयों के निर्वहन करने पर मिलने वाले इनाम के मामले में हैं । क़ुरान इसका स्पष्ट प्रमाण देता है ’’ मैं तुमें से किसी का अमल अकारथ करने वाला नहीं हूं, चाहे वो मर्द हो या औरत……….’’ (क़़ुरान 3-195)।

इस्लाम महिला को इज़्ज़त देता है उसको चल अचल सम्पत्ति रखने का अधिकार देता है, षिक्षा का अधिकार, कार्य करने का अधिकार, रोज़गार पाने के महिला के अधिकार के संबध में इस्लाम ऐसा कोई फरमान नहीं देता है जिसमें महिला को जब भी आवष्यकता हो, रोज़गार तलाश करने से मना करता हो, ख़ासकर उन पदो के लिये जो उसकी प्रकृति के अनुकूल हैं और जिसमें समाज को उसकी सबसे अधिक ज़रूरत है विशेषकर डॉक्टर्स, नर्सिंग के क्षेत्र में शिक्षा के क्षेत्र में (ख़ास तौर पर बच्चों के लिये) , इसके अलावा भी किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की असाधारण प्रतिभा से लाभान्वित होने पर कोई प्रतिबंध नहीं है ।

इस्लाम के अनुसार इन्सान अपने परमेश्वर अपने निर्माता का आज्ञाकारी सेवक है और वह अपने नैतिक मूल्यों को ध्यान में रख कर अपने अधिकार प्राप्त करने के साथ साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करता है तो एक राष्ट्र को आकार मिलता है । एक मज़बूत परिवार से मज़बूत समाज की स्थापना होती है और एक नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज ही एक मज़बूत देश की स्थापना करता है ।

इस्लाम महिलाओं को गर्व का स्थान देता है वह एक पत्नि के रूप में महिला को सम्मान, देता है तो माता के पैरों के नीचे स्वर्ग बता कर एक मां को सम्मान देता है, तो बहन, पुत्री की परवरिश  करने उनकी समय पर विवाह करने पर इनाम में स्वर्ग का वादा देकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है ।

विवाह उपरान्त दहेज नहीं ’’महर’’ (स्त्री धन) जो की महिला को पुरूष द्वारा दिया जाना अनिवार्य क़रार देता है ।

निष्कर्ष

महिलाओं के ख़िलाफ बढ़ता अपराध इस सभ्यता के विरूद्ध एक धब्बा है, इसको रोकने के लिये तत्काल उपाय नहीं किये गये तो इतिहास बहुत सख़्ती से इसका न्याय करेगा, सख़्त क़ानून, फास्ट ट्रेक अदालतें इस ख़तरे का एक मात्र साधन नहीं है । समाज में हृदय के पूण परिवर्तन की आवश्यक्ता है जो केवल एक ऐसी प्रणाली द्वारा लाया जा सकता है जो धर्मपरायणता, सदाचार, ईश्वर भय, परलोक में जवाबदेही में विश्वास और जो महिलाओं को सम्मान देने व उसे स्नेह मे रखता हो ।

महिलाओं के ख़िलाफ अपराध केवल वही समाज रोक सकता है जो विवाह को आसान और व्यभिचार को कठिन बना दे,  जो ’महर’ देता हो और दहेज नहीं लेता हो । जो मां के चरणों में स्वर्ग देखता हो, किसी महिला को किसी भी रूप में बाज़ार में नहीं बेचता हो । ऐसा समाज केवल क़ुरान के इस्लामी सिद्धान्तों और पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल0 की महान शिक्षाओं की नीवं पर बनाया और उठाया जा सकता है ।

आज की स्त्री एक सभ्य समाज के निर्माण की प्रतिक्षा में ……………………….

 

ग़ज़ाला परवीन (राज.)