प्रधान मंत्री के संसदीय क्षेत्र को अपनी स्मार्ट सिटी योजनाओं में वायु प्रदूषण प्रबंधन की आवश्यकता

Airforce maneuvers in Rajasthan on 7th, PM Modi will come
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वायु प्रदूषण (Air Pollution) नीति निगरानी मंच, NCAP ट्रैकर के एक विश्लेषण से पता चला है कि वाराणसी में PM2.5 और NOx दोनों का स्तर पिछले तीन वर्षों से लगातार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की सुरक्षा सीमा से ऊपर बना हुआ है। CPCB ने PM2.5 और NO2 दोनों स्तरों के लिए सुरक्षा मानक के रूप में 40 ug/m3 वार्षिक औसत निर्धारित किया है। शहर में लगातार तीन साल से 2021 तक PM2.5 क्रमश: 96, 67 और 61 रहा है। उत्सर्जन स्रोतों पर लॉकडाउन के प्रभावों के कारण, वायु प्रदूषण का मूल्यांकन करते वक़्त, 2020 को अधिकांश विशेषज्ञों द्वारा एक विसंगति वर्ष के रूप में गिना जाता है। 2021 के लिए 12 दिसंबर तक के आंकड़े लिए गए हैं। इस बीच पिछले 3 वर्षों से NO2 का स्तर क्रमशः 55, 31 और 53 ug/m3 रहा है। वाहन उत्सर्जन नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में से एक है, साथ ही जीवाश्म-ईंधन आधारित बिजली संयंत्र, भस्मीकरण संयंत्र, अपशिष्ट जल उपचार सुविधाएं, कांच और सीमेंट उत्पादन सुविधाएं और तेल रिफाइनरी जैसे स्रोत हैं।

डाटा का मूल्यांकन वाराणसी में स्थापित कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम (CAAQMS) से किया गया है। 2021 में, दो मॉनिटर जोड़े गए, एक जून में और दूसरा जुलाई में जिससे कुल 4 मॉनिटर हो गए। लेकिन चूंकि ये तीन मॉनिटर वार्षिक औसत के लिए लगभग 70% मॉनिटर किए गए दिनों नहीं बनाते हैं, इसलिए वार्षिक तुलना के लिए केवल वो मॉनिटर माना जाता है जो 2019 और 2020 में मौजूद था। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में चार मॉनिटरिंग स्थलों में से, अर्धली बाजार के भीड़-भाड़ वाले और व्यस्त यातायात क्षेत्र में से एक शहर का सबसे लंबा चलने वाला स्टेशन रहा है, जिसका वार्षिक NO2 औसत CPCB सीमा का लगभग 1.5 गुना है। NO2 के लिए WHO की निर्धारित सुरक्षा सीमा दैनिक औसत के लिए 25 ug/m3 और वार्षिक के लिए 10 ug/m3 है। भारत में, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड (NO2 और SO2) जैसे प्रीकर्सर गैसों के सेकेंडरी PM2.5 में तेज़ी से रूपांतरण के लिए मौसम संबंधी स्थिति अत्यधिक अनुकूल है। अत: PM2.5 को नियंत्रित करने के लिए प्रीकर्सर गैसों का उत्सर्जन नियंत्रण आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर NO2 के संपर्क में आने से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं।

 

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा, “यह डाटा इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि PM2.5 को कण बनाने में क्या जाता है और प्रदूषण को कम करने के लिए कदम उठाने से पहले हमें यह ज्ञान होना चाहिए। ऐसी सूचनाओं पर ध्यान केंद्रित करने से स्थानीय और राज्य सरकारों, केंद्र और नागरिकों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि कहां कार्रवाई करनी है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की औसत सांद्रता से अधिक सांद्रता वर्ष भर होने के कारण, जो स्पष्ट रूप से व्यस्त यातायात या उच्च घनत्व वाले औद्योगिक क्षेत्रों में है, यह दर्शाता है कि कार्रवाई कहाँ होनी चाहिए।

 

स्मार्ट शहरों में से एक के रूप में वाराणसी बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजना के विकास के दौर से गुजर रहा है, बिजली की कमी की भरपाई भारत के अधिकांश टियर 3 शहरों जैसे डीजल जेनसेट द्वारा की जाती है और दिल्ली में पुराने वाहनों को स्क्रैप करने के लिए 15 साल की सीमा के विपरीत, उत्तर प्रदेश की परिवहन स्क्रैपेज नीति 20 साल पुराने वाहनों को सड़कों पर चलते रहने की अनुमति देती है। निगरानी और अनुपालन के लिए सीमित संसाधनों के साथ, 20 वर्ष से अधिक पुराने वाहन भी शायद शहर की सड़कों और आंतरिक गलियों में चल रहे हैं, जिससे शहर में परिवहन उत्सर्जन में वृद्धि हो सकती है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) द्वारा वाराणसी में शहरी PM2.5 के स्थानीय और दूरस्थ स्रोतों पर 2018 के स्रोत प्रभाजन अध्ययन ने यातायात को प्रमुख संभावित स्थानीय स्रोत के रूप में पहचाना, जिसने उच्च PM स्तर के बाद पक्की सड़क की धूल और स्थानीय दहन गतिविधियों में योगदान दिया। भूमि उपयोग प्रतिगमन विश्लेषण ने शहर में PM2.5 वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में यातायात चर जैसे भारी वाहन तीव्रता, राजमार्ग से दूरी, यातायात तीव्रता (500 मीटर बफर के भीतर) और हरित कवर का प्रतिशत भी पहचाना। मौसम संबंधी कारकों के साथ, NO2 और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) को भी प्रमुख गैसीय वायु प्रदूषकों के रूप में पहचाना गया, जिन्होंने इस पवित्र शहर में PM सांद्रता को संशोधित किया।

 

प्रोफेसर एस.एन. त्रिपाठी, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, IIT कानपुर और संचालन समिति के सदस्य, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम, MoEFCC ने कहा, “वायु प्रदूषण का स्तर CPCB द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक प्रतीत होता है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के तहत सेंसर का उपयोग करके घनी निगरानी प्रदूषण स्रोतों को ट्रैक और कम करने में मदद कर सकती है। ई-बसें भी वाहनों से होने वाले प्रदूषण को काफ़ी हद तक कम करने में मदद कर सकती हैं।

 

चूंकि शहर में निरंतर मॉनिटरिंग केवल 2015 में शुरू हुई थी, BHU और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक अध्ययन ने वाराणसी के लिए 15 साल के उपग्रह और जलवायु विज्ञान डाटा की जांच की, जिससे इस अवधि में, PM2.5 में प्रति वर्ष तेज़ी से (1.5-3%) वृद्धि हुई, और वर्ष में 87% दिनों राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर PM2.5 के स्तर की दृढ़ता का अनुभव होता हैं। यह 5700 वार्षिक समय से पहले होनी वाली मृत्युों (जनसंख्या का 0.16%) का बोझ है, जिनमें से 29%, 18%, 33%, 19% और शेष 1% क्रमशः इस्केमिक हृदय रोग, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़, एक्यूट निचले श्वसन संक्रमण और फेफड़ों के कैंसर के लिए ज़िम्मेदार हैं।

 

हालांकि यह सराहनीय है कि शहर के अधिकारियों ने CAAQMS मॉनिटर के अपटाइम (प्रति दिन डाटा की उपलब्धता का प्रतिशत) को CPCB दिशानिर्देशों के अनुसार 70% की आवश्यक सीमा से ऊपर बनाए रखा है, 2021 के मासिक विश्लेषण से पता चलता है कि मानसून के महीनों के अलावा अन्य जून से सितंबर तक PM2.5 का स्तर CPCB की सुरक्षा सीमा से ऊपर बना हुआ है। NO2 का स्तर भी जनवरी से अप्रैल 2021 तक 60 के दशक में बना रहा और नवंबर 2021 में फिर से चरम पर पहुंचना शुरू हो गया। इस विश्लेषण के लिए 2021 में मासिक औसत की गणना उस समय पर स्थापित मॉनिटरों की कुल संख्या के आधार पर की गई थी। इसलिए, प्रत्येक साइट से अलग-अलग डाटा-सेट का विश्लेषण करके NO2 परिवर्तनशीलता को समझा जा सकता है, उदाहरण के लिए, नवंबर 2021 में BHU के ग्रीन कैंपस में NO2 18 और PM2.5 96 ug/m3 पर दर्ज किया गया था, जबकि नवंबर NO2 का स्तर अर्धली बाज़ार में 65 ug/m3, मालदहिया (40) और भेलूपुर (38), महीने के लिए सभी चार साइटों का कुल औसत 41 ug/m3 पर, दर्ज किया गया था।

रेस्पिरर लिविंग साइंसेज़ के संस्थापक और सीईओ रौनक सुतारिया ने कहा, “वाराणसी शहर 82 वर्ग किमी में 10 लाख से अधिक आबादी के साथ फैला हुआ है और इसमें प्रदूषण के जटिल शहरी स्रोत हैं जिनके लिए पूरे शहर में कम से कम 15 से 20 वायु गुणवत्ता मॉनीटर की आवश्यकता होती है। एकल निरंतर AQ मॉनिटर अब 3 और स्थानों के साथ संवर्धित है, जबकि सही दिशा में वाराणसी जैसे वैश्विक आध्यात्मिक शहर के लिए अपर्याप्त है। वर्तमान में विश्लेषण किए गए डाटा से पता चलता है कि एकल स्थान के स्तर असुरक्षित स्तरों पर बने हुए हैं। बेहतर साक्ष्य आधारित नीतियों के लिए, प्रोत्साहन (उद्योगों और नागरिकों द्वारा प्रभावी मिटिगेशन के लिए) और प्रभावशील करने / लागु करने (अपराध दोहराने वाले अपराधियों के लिए) के साथ अधिक हाइपर-लोकल मॉनिटरिंग जीवन गुणवत्ता में सुधार करने का सबसे प्रभावी तरीका होगा।”

 

वाराणसी के वायु प्रदूषण परिदृश्य पर 2016 की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक ‘वाराणसी चोक्स’ था, ने दावा किया कि शहर में 227 दिनों का मॉनिटरिंग डाटा था, जिसमें से शून्य अच्छे वायु दिन थे, या ऐसे दिन जब स्तर CPCB के निर्धारित दैनिक औसत से नीचे रहे। रिपोर्ट में उद्धृत 2016 के CPCB बुलेटिन के अनुसार, इलाहाबाद भी शून्य अच्छे वायु दिनों के साथ रैंक हुआ, और लखनऊ में 15 , कानपुर (85), आगरा (28), और गाज़ियाबाद (5) दिन थे।

 

NCAP ट्रैकर के बारे में

NCAP ट्रैकर भारत की स्वच्छ वायु नीति में नवीनतम अपडेट के लिए एक ऑनलाइन हब बनाने के लिए कार्बनकॉपी और रेस्पिरर लिविंग साइंसेज़ द्वारा एक संयुक्त परियोजना है। इसे राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत निर्धारित 2024 स्वच्छ वायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारत की प्रगति को ट्रैक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

NCAP ट्रैकर वायु गुणवत्ता डाटा के विभिन्न स्तरों को संकलित और मूल्यांकन करके और स्वच्छ वायु नीति की प्रभावशीलता को बारीकी से ट्रैक करके इसे सक्षम बनाता है। ट्रैकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध या भारत सरकार द्वारा प्रदान की गई वायु गुणवत्ता और बजट आवंटन पर जानकारी का संकलन और विश्लेषण करता है।

 

Dr.Seema Javed
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद , वरिष्ठ पत्रकार और

जलवायु परिवर्तन की रणनीतिक संचारक