There is no other actor like Dilip Kumar

There can be no other actor like Dilip Kumar. If anyone tries to be like that, then he will be an imitation of him, not the real one. The death of Yusuf Khan, son of a Pathan merchant of fruits, to become Dilip Kumar can be just as a coincidence that seed falls on the …

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July 7, 2021 9:43 pm

There can be no other actor like Dilip Kumar. If anyone tries to be like that, then he will be an imitation of him, not the real one. The death of Yusuf Khan, son of a Pathan merchant of fruits, to become Dilip Kumar can be just as a coincidence that seed falls on the ground, rain comes and a plant grows. But after that, the journey of that plant to become a banyan tree is not a coincidence. It is his hard work, his passion for learning, that makes Yusuf Khan Dilip Kumar. On the path of acting he went on, he kept himself alone from the crowd.

There is a scene in ‘Mughal-e-Azam’ when all the preparations have been made to shoot down Shahzada Salim with a cannonball. Salim is being tied to a high place with a mask and taken to be shot by a cannon. Dilip Kumar in the role of Salim suddenly stumbles while climbing the stairs and turns back. He has a close-up on the whole screen. Speaking of Salim’s character, he makes a short argument in which he tells a group of thousands of people and soldiers to present there: “My aakhri iltiza hai Duniya Mein Dil wale ka sath Dena…” But Yusuf Khan has always kept his eyes open. Mind worked. He was always conscious of who he had to work with and how his role in films was to emerge. With this, actor Dilip Kumar could be established as a great artist.

Dilip Kumar was not a trained actor but with his debut in cinema, he learned this genre from directors mastered like Eklavya. This self-study made him a high star as well as a fine artist. In this sense, this artist was a genius.

Yusuf Khan neatly created a distinctive image of actor Dilip Kumar. But this image was not hollow, so it never faded. Also because the artist inside that image was always cooking. It was Yusuf Khan’s awareness that the perfect artist Dilip Kumar could break the groove of “Tragedy King” with a stroke.

The artist lived life on his terms with this image that was not very open. He had the right to this privacy. However, there were occasions when he was seen staggering in life, and on-screen as well. But while working with his mind, he recovered very soon.

Dilip Kumar garnered a lot of love and respect from the cine audience. He didn’t get it by luck. He had earned.

Dilip Kumar and Shammi Kapoor have a duet on Dilip Kumar and Shammi Kapoor in the 1982 film ‘Vidhata’ in which Shammi sings “Hath ki chand lirekar ka sab Khel hai bas Calderon ka”. In response to this, Dilip replies, “Fate is what I know, I am a lover of dreams”. These lines fit perfectly on Dilip Saab.

He was seriously ill for a long time but was with us. We wished him a centenary. But this morning we got the news we didn’t want to hear. His body has died. Actor Dilip Kumar will live on forever in his characters on screen. That’s why this artist will be immortal.

दिलीप कुमार जैसा अदाकार और कोई नहीं हो सकता। यदि कोई वैसा बनने का प्रयास करेगा तो वह उसकी नक़ल ही होगा, असल नहीं। फलों के पठान व्यापारी के बेटे युसुफ खान का दिलीप कुमार हो जाना वैसा संयोग हो सकता है जैसे कोई बीज जमीन पर गिरे, बारिस आ जाय और पौधा उग आए। मगर उसके बाद बरगद जैसा पेड़ बनने की उस पौधे की यात्रा संयोग नहीं है। वह उसकी अपनी मेहनत है सीखने की लगन है जिससे युसुफ खान दिलीप कुमार बनता है।अभिनय की जिस राह पर वह चला उस पर वह अपने को भीड़ से अकेला करता चला गया।

‘मुग़ल-ए-आज़म’ में एक दृश्य है जब शाहज़ादा सलीम को तोप के गोले से उड़ा दिये जाने की सारी तैयारियां हो चुकी है। सलीम को एक ऊंचे स्थान पर मुश्कों से बांध कर तोप से उड़ा देने के लिए ले जाया जा रहा है। सलीम के किरदार में दिलीप कुमार सीढ़ियां चढ़ते हुए अचानक ठिठकते हैं पीछे मुड़ते हैं। पूरे पर्दे पर उनका क्लोज़ अप है। सलीम के किरदार को ज़ुबान देते हुए वे एक छोटी सी तकरीर करते हैं जिसमें वे वहां मौजूद हजारों प्रजाजनों और सैनिकों के समूह से कहते हैं: “मेरी आखरी इल्तिज़ा है दुनिया में दिल वाले का साथ देना…” लेकिन युसुफ खान ने हमेशा अपने दिमाग से काम लिया। किनके साथ उन्हें काम करना है और फिल्मों में उनकी भूमिका किस तरह से उभरनी है इसके लिए वे हमेशा सचेत रहे। इसी से अभिनेता दिलीप कुमार महान कलाकार के रूप में स्थापित हो सका।

दिलीप कुमार प्रशिक्षित अभिनेता नहीं थे परंतु सिनेमा में पदार्पण के साथ ही उन्होंने इस विधा को एकलव्य की भांति निष्णात निर्देशकों से सीखा। इस स्वाध्याय ने उन्हें ऊंचे स्टार के साथ साथ उम्दा कलाकार भी बनाया। इस माने में यह कलाकार जीनियस था।

युसुस खान ने बड़े करीने से अभिनेता दिलीप कुमार की एक विशिष्ट छवि बनाई। मगर यह छवि खोखली नहीं थी इसलिए वह कभी फीकी नहीं पड़ी। इसलिए भी कि उस छवि के अंदर का कलाकार हमेशा पकता रहा। युसुफ खान की सजगता ही थी कि मुकम्मल कलाकार दिलीपकुमार “ट्रेजेडी किंग” के खांचे को झटके से तोड़ सका।

इस कलाकार ने अपनी इस छवि के साथ अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी, जो बहुत खुली नहीं थी। उन्हें इस निजता का अधिकार था। हालांकि ऐसे मौके भी आये जब वे ज़िंदगी में, और परदे पर भी, डगमगाते नज़र आए। मगर दिमाग से काम लेते हुए बहुत शीघ्र संभल भी गये।

दिलीप कुमार ने सिने दर्शकों का भरपूर प्यार और आदर पाया। यह उन्हें भाग्य से नहीं मिला। उन्होंने अर्जित किया था।

वर्ष 1982 में आई फिल्म ‘विधाता’ में कोयले से चलने वाले इंजिन में दिलीप कुमार और शम्मी कपूर पर एक दोगाना है जिसमें शम्मी गाते हैं “हाथों की चंद लकीरों का सब खेल है बस तक़दीरों का”। इसके जवाब में दिलीप जवाब देते हैं “तक़दीर है क्या मैं क्या जानूं, मैं आशिक हूं तदबीरों का”। ये पंक्तियां दिलीप सा’ब पर एकदम सही उतरती है।

लंबे समय से वे गंभीर रूप से बीमार थे, मगर हमारे साथ थे। हम उसके शतायु होने की कामनाएं करते थे। परंतु आज सुबह वह खबर मिली जिसे हम सुनना नहीं चाहते थे। उनके शरीर का निधन हुआ है। अदाकार दिलीप कुमार पर्दे पर किरदारों में वह हमेशा जीवित रहेगा। इसीलिए यह कलाकार अमर रहेगा।

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