कंकणाकृति खण्डग्रास सूर्य ग्रहण शुभाशुभ योग

Astrology News । आषाढ़ कृष्णा अमावस्या रविवार 21 जून को कंकणाकृति। खण्डग्रास सूर्य ग्रहण भारतीय मानक समय प्रात 9.16 बजे से दोपहर 3.04 बजे के मध्य में अवधि 5.48 घंटे अलग-अलग समय पर भारत में दिखाई देगा। ग्रहण की कंकणा कृति परमग्रास के समय उत्तर भारत में घड़साना, सुरतगढ़, सिरसा, कुरुक्षेत्र, देहरादून, टिहरी, यमुनानगर, जोशीमठ …

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June 17, 2020 1:25 pm

Astrology News । आषाढ़ कृष्णा अमावस्या रविवार 21 जून को कंकणाकृति। खण्डग्रास सूर्य ग्रहण भारतीय मानक समय प्रात 9.16 बजे से दोपहर 3.04 बजे के मध्य में अवधि 5.48 घंटे अलग-अलग समय पर भारत में दिखाई देगा। ग्रहण की कंकणा कृति परमग्रास के समय उत्तर भारत में घड़साना, सुरतगढ़, सिरसा, कुरुक्षेत्र, देहरादून, टिहरी, यमुनानगर, जोशीमठ एवं इन के समीपस्थ स्थानों में अधिकतम 24 सैकण्ड तक दिखाई देगी। जिसका पथ 21 किलोमीटर चौड़ा होगा। इस अवधि में दिन में अंधकार जैसा दृश्य होगा।

शेष भारत में यह ग्रहण खण्डग्रास आकृति में राजस्थान, दिल्ली, उतरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखंड एवं आसाम आदि में दिखाई देगा। मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान टोंक के निदेशक ज्योतिषाचार्य बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि भारत में यह ग्रहण कंकणाकृति एवं खण्डग्रास के रूप में दिखाई देगा, ग्रहण की कंकणाकृति कांगो से प्रारंभ होकर दक्षिण सुडान, यमन, ओमान, पाकिस्तान, हिमाचल प्रदेश, उतराखण्ड, राजस्थान, हरियाणा, तिब्बत, चीन, ताईवान में दिखाई देगी। खण्डग्रास ग्रहण दक्षिण पश्चिम अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी यूरोप, मध्य पूर्वी एशिया, उतरी व पूर्वी रुस को छोडक़र इंडोनेशिया, माईक्रोनेशिया, हिन्द महासागर, पेसिफिक महासागर एवं प्रशांत महासागर आदि में पूर्ण रुप से दिखाई देगा।

राजस्थान में ग्रहण का प्रारंभ सुबह 10.14 बजे होगा एवं समाप्त दोपहर 1.44 बजे होगा। इसका पर्वकाल 3.30 घंटे का होगा। धर्मशास्त्र के अनुसार ग्रहण का सुतक चार प्रहर अर्थात 12 घंटे पूर्व 20 जून शनिवार रात्रि 10.14 बजे से प्रारंभ होगा। सूतक काल में बालकों, बुजुर्गो, रोगियों को छोडकऱ धार्मिकजनों को भोजनादि नहीं करने के निर्देश शास्त्रों में मिलते हैं, निर्णय दीपिका में लिखा है कि कम से कम एक प्रहर अर्थात तीन घंटा पूर्व से सभी सूतकों नियमों का पालन करना चाहिए। मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान टोंक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि रविवार को ग्रहण होने से यह चुड़ामणी संज्ञक सूर्य ग्रहण कहलाता है।

ग्रहण प्रारंभ के समय चन्द्रमा मृगशीरा नक्षत्र में स्वामी मंगल दिन में एक बजे आद्र्रा नक्षत्र में स्वामी राहू सूर्य मृगशीरा नक्षत्र में राशि मिथुन स्वामी बुध में विचरण कर रहे हैं। चन्द्रमा से पूर्व मिथुन राशि में सूर्य बुध राहू बैठे है जो चतुर्थग्रही योग बना रहे हैं, जिन पर केतु की सप्तम दृष्टि है, द्वादश भाव में शुक्र अपनी वृष राशि में वक्री होकर विचरण कर रहे है, गुरु शनि मकर राशि में वक्री होकर विचरण कर रहे हैं, जो चन्द्रमा से षड़ाष्टक योग बना रहे हैं, जो राजनैतिक उथल पुथल के साथ-साथ प्राकृतिक प्रकोपों से जन धन की हानि के अनिष्ट एवं अशुभ फल के योग बना रहे हैं। पड़ोसी देशो के मध्य तनाव के योग बनेगें।

अनिष्ट एवं अशुभ फलों में वृद्धि होगी। रविवार को ग्रहण होने से सभी प्रकार के जिंस खाद्यान अन्न, तेल, गुड़, घी, चीनी, लोहा, सोना, चांदी, शेयर्स, पशुओं, वाहनों में तेजी आयेगी, व्यापारियों एवं विप्रजनों को विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि गुरु, शुक्र, शनि, बुध, ग्रह वक्री चल रहे है। राहू केतु तो सदैव वक्री रहते हैं। ग्रहण के समय चन्द्रमा का मंगल, राहू, बुध के प्रभाव में होना तथा 6 ग्रहों का वक्री होना अनिष्ट एवं अशुभ फलदायक है।

यह ग्रहण मृगशीरा, आद्र्रा नक्षत्र, मिथुन राशि में घटित हो रहा है, अत: इनके जातकों को शान्ति करना चाहिए। देश में वर्तमान समय में कोरोना वायरस का प्रभाव है, जिसके प्रभाव से मुक्ति के लिए देश व जनता के हित में सूर्यग्रहण के प्रारंभ से स्नान करना, मध्य में हवन-पूजा पाठ, आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करना एवं अनिष्ट अशुभ ग्रहों की शांति करने का हजार गुना फल मिलता है, ग्रहण वैध के समय अन्न वस्त्र, धन सवर्ण आदि का दान करना चाहिए। सूतक पश्चात लाल वस्तुओं, हरा चारा आदि का दान करने से अशुभ फलों में कमी आती है।

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